अतुल्य भारत चेतना
प्रमोद कश्यप
रतनपुर। ऐतिहासिक नगरी रतनपुर, जो विभिन्न सांस्कृतिक परंपराओं की धरोहर के लिए जानी जाती है, आज देव उठनी एकादशी के पावन अवसर पर गौरी-गौरा विवाह कार्यक्रम का भव्य आयोजन करा। यह आदिवासी परंपरा, जो आदिकाल से चली आ रही है, प्रधान समाज के लोगों द्वारा सैकड़ों वर्षों से निभाई जा रही है। रतनपुर के करैहापारा मोहल्ले के बेदपारा में आयोजित इस उत्सव ने स्थानीय निवासियों में गहन आस्था और उत्साह का संचार किया। गौरी-गौरा, जो भगवान शिव और माता पार्वती के प्रतीकात्मक रूप हैं, का विवाह रस्म न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि सामुदायिक एकता और सांस्कृतिक समृद्धि का भी प्रतीक है।

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परंपरा का प्राचीन महत्व
छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति में गौरी-गौरा विवाह का विशेष स्थान है। यह उत्सव मुख्य रूप से दीपावली के बाद मनाया जाता है, लेकिन देव उठनी एकादशी पर इसका आयोजन भगवान विष्णु के जागरण के साथ शुभ कार्यों की शुरुआत का प्रतीक बन जाता है। रतनपुर जैसे ऐतिहासिक स्थलों में यह परंपरा आदिवासी समुदायों द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी निभाई जाती रही है। मान्यता है कि गौरी-गौरा का विवाह दांपत्य जीवन की सुख-समृद्धि और पारिवारिक एकता को मजबूत बनाता है। इस वर्ष भी, जैसे हर साल, यह आयोजन रात्रिकालीन शोभायात्रा के साथ प्रारंभ हुआ, जो स्थानीय परंपराओं की जीवंतता को दर्शाता है।

आयोजन की मुख्य झलकियां
कार्यक्रम की शुरुआत महामाया पारा के कुशल चित्रकारों द्वारा निर्मित गौरी-गौरा की सुंदर प्रतिमाओं से हुई। इन प्रतिमाओं को बरईपारा स्थित गणेश बाड़ा से गाते-बजाते, नाचते-गाते शोभायात्रा के रूप में लाया गया। रास्ते भर मोहल्ले के सभी घरों में इनका भव्य स्वागत किया गया, जहां महिलाओं ने फूलों, आरती और मंगल गीतों से अभिवादन किया।
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एक अनोखी परंपरा के तहत, कई महिलाएं रास्ते में अपने दरवाजों के सामने लेटकर प्रतिमा को अपने शरीर के ऊपर से पार करवाती रहीं। यह दृश्य आस्था की पराकाष्ठा को प्रदर्शित करता था, जहां भक्तजन अपनी श्रद्धा से दिव्य शक्ति का आह्वान करते नजर आए।

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शोभायात्रा के दौरान मोहल्ले का एक व्यक्ति ‘लंगूर’ की भूमिका निभाता रहा। वह उछल-कूद करता हुआ चलता और प्रत्येक घर से एकादशी उपवास के फलाहार (फल, मिठाई आदि) ग्रहण करता। यह दृश्य न केवल मनोरंजक था, बल्कि उत्सव की जीवंतता को बढ़ाने वाला सिद्ध हुआ। यात्रा का समापन मोहल्ले के परधान खोली में स्थित गौरा-गौरी चौरा पर हुआ, जहां विवाह की सभी रस्में विधि-विधान से संपन्न की गईं।

रात्रि जागरण और सांस्कृतिक उत्सव
विवाह रस्म के बाद पूरे रात्रि भर मांदर की थाप पर लोक गीत, नृत्य और जसगीत का आयोजन चला। महिलाएं और युवा परिधानों में सज-धजकर भाग लेते रहे, जो छत्तीसगढ़ की आदिवासी संस्कृति की समृद्धि को उजागर करता था। यह रात्रि जागरण न केवल धार्मिक था, बल्कि सामाजिक मेलजोल का माध्यम भी बना।

विसर्जन और समापन
द्वादशी के पावन दिवस पर गौरी-गौरा की प्रतिमाओं का विसर्जन मोहल्ले के रत्नेश्वर सरोवर में धूमधाम से किया गया। विसर्जन यात्रा में फिर से गीत-संगीत और नृत्य के साथ प्रतिमाओं को तालाब तक ले जाया गया, जहां भावुक भक्तजनों ने विदाई दी। यह परंपरा पर्यावरण संरक्षण के दृष्टिकोण से भी प्रासंगिक है, क्योंकि प्रतिमाएं प्राकृतिक सामग्री से निर्मित होती हैं।
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प्रमुख आयोजकों की भूमिका
इस वर्ष के आयोजन में प्रधान समाज के प्रमुख सदस्यों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। विशेष रूप से सक्रिय रहे:
भागीरथी प्रधान, संतोष प्रधान, राजकुमार प्रधान, नरोत्तम प्रधान, रामायण धीवर, दीलिप धीवर
इनके नेतृत्व में न केवल आयोजन सुचारू रूप से चला, बल्कि स्थानीय समुदाय की भागीदारी भी सुनिश्चित हुई। आयोजकों ने बताया कि यह परंपरा नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का माध्यम है।

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सामाजिक संदेश
यह आयोजन छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विविधता को रेखांकित करता है, जहां आदिवासी परंपराएं मुख्यधारा से जुड़कर नई ऊर्जा प्राप्त करती हैं। रतनपुर के निवासियों ने इस उत्सव के माध्यम से एकता और आस्था का संदेश दिया। आयोजकों ने सभी सहभागियों का आभार व्यक्त करते हुए आगामी वर्षों में भी इस परंपरा को और भव्य बनाने का संकल्प लिया।

