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बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज, सागर में फेफड़ों की गंभीर बीमारियों की जांच के लिए नई सुविधा शुरू

बीएमसी की बड़ी उपलब्धि अब फेफड़ों की गंभीर बीमारियों की जांच होगी आसान पी एफ टी (PFT) और एफ ओ टी (FOT) सुविधा शुरू अस्थमा और सीओपीडी (COPD) के मरीजों को अब नहीं जाना होगा बाहर; अत्याधुनिक मशीनों से होगा सटीक इलाज

ओपीडी कक्ष क्रमांक 12 में सोमवार से शनिवार तक मिलेगी सुविधा; डॉ. पी. एस. ठाकुर ने किया शुभारंभ

अतुल्य भारत चेतना (धर्मेंद्र साहू)

सागर: बुंदेलखंड चिकित्सा महाविद्यालय (बीएमसी), सागर ने स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। अब संभाग के मरीजों को फेफड़ों से संबंधित जटिल बीमारियों की जांच के लिए निजी केंद्रों या बड़े शहरों का चक्कर नहीं लगाना पड़ेगा। सोमवार को फिजियोलॉजी एवं रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग के संयुक्त तत्वावधान में पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट (पीएफटी – PFT) और फोर्स्ड ऑसिलेशन टेक्नीक (एफओटी – FOT) जैसी अत्याधुनिक जांच सुविधाओं का विधिवत शुभारंभ किया गया।

इस सुविधा का उद्घाटन अधिष्ठाता डॉ. पी. एस. ठाकुर और अधीक्षक डॉ. राजेश जैन ने संयुक्त रूप से किया। यह नई सुविधा मरीजों के लिए विशेष रूप से उन लोगों के लिए संजीवनी साबित होगी जो अस्थमा, क्रॉनिक ऑब्स्ट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी – COPD), पल्मोनरी फाइब्रोसिस (फेफड़ों का कड़क होना) और अन्य श्वसन संबंधी गंभीर संक्रमणों से पीड़ित हैं।

सुविधा की उपलब्धता और समय

अधिष्ठाता डॉ. पी. एस. ठाकुर ने बताया कि जनहित को ध्यान में रखते हुए यह सुविधा सोमवार से शनिवार तक प्रतिदिन उपलब्ध रहेगी। मरीज ओपीडी कक्ष क्रमांक 12 में सुबह 9:00 बजे से दोपहर 2:00 बजे तक इस सुविधा का लाभ उठा सकते हैं। अत्याधुनिक मशीनों के माध्यम से इन जांचों से बीमारियों का सटीक निदान संभव होगा, जिससे इलाज भी अधिक प्रभावी और लक्षित होगा।

पीएफटी और एफओटी जांच के लाभ

मीडिया प्रभारी डॉ. सौरभ जैन ने विस्तार से जानकारी देते हुए बताया कि पीएफटी पारंपरिक स्पाइरोमेट्री पर आधारित है, जबकि एफओटी (फोर्स्ड ऑसिलेशन टेक्नीक) एक आधुनिक, गैर-आक्रामक विधि है जिसमें सामान्य सांस लेते समय छोटी दबाव तरंगें फेफड़ों में भेजी जाती हैं। इससे फेफड़ों की प्रतिरोधकता (रेसिस्टेंस) और रिएक्टेंस का सटीक मापन होता है। यह तकनीक विशेष रूप से छोटी वायुमार्गों (स्मॉल एयरवेज) की समस्याओं का जल्दी पता लगाने में उपयोगी है।

ये जांचें अस्थमा, सीओपीडी, फेफड़ों के फाइब्रोसिस और अन्य श्वसन रोगों के निदान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। इससे मरीजों को समय पर सही उपचार मिल सकेगा और बाहर जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

शैक्षणिक और अनुसंधान महत्व

यह सुविधा केवल मरीजों के लिए ही नहीं, बल्कि कॉलेज के पोस्ट ग्रेजुएट (पीजी) छात्रों के लिए भी बेहद उपयोगी साबित होगी। आधुनिक मशीनों की उपलब्धता से छात्रों को क्लीनिकल अनुभव मिलेगा और श्वसन रोगों से जुड़े रिसर्च कार्यों में सागर मेडिकल कॉलेज को नई ऊंचाइयां हासिल होंगी।

उद्घाटन समारोह में उपस्थिति

इस गौरवपूर्ण अवसर पर फिजियोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. रविकांत अरजरिया, पल्मोनरी मेडिसिन विभागाध्यक्ष डॉ. तल्हा साद के अलावा डॉ. अमरदीप राय, डॉ. अंजु झा, डॉ. रीमा गोस्वामी, डॉ. रमेश पाण्डेय, डॉ. सर्वेश जैन, डॉ. सत्येंद्र उइके, डॉ. आशीष जैन, डॉ. सत्येंद्र मिश्रा, डॉ. प्रियांशु सहित दोनों विभागों के वरिष्ठ चिकित्सक, पीजी छात्र और कर्मचारी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।

बीएमसी सागर की यह पहल बुंदेलखंड क्षेत्र के स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे न केवल मरीजों को राहत मिलेगी, बल्कि मेडिकल शिक्षा और अनुसंधान के क्षेत्र में भी संस्थान की प्रतिष्ठा बढ़ेगी।

पीएफटी (Pulmonary Function Test) और एफओटी (Forced Oscillation Technique) के लाभ: विस्तार से

फेफड़ों की बीमारियों जैसे अस्थमा, सीओपीडी (क्रॉनिक ऑब्स्ट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज), पल्मोनरी फाइब्रोसिस आदि के निदान और प्रबंधन में पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट (पीएफटी) और फोर्स्ड ऑसिलेशन टेक्नीक (एफओटी) महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये दोनों जांचें फेफड़ों की कार्यक्षमता का आकलन करती हैं, लेकिन इनकी विधि और लाभ अलग-अलग हैं। नीचे इनके लाभों को विस्तार से समझाया गया है।

पीएफटी (PFT) के मुख्य लाभ

पीएफटी में मुख्य रूप से स्पाइरोमेट्री शामिल होती है, जिसमें मरीज को गहरी सांस लेकर तेजी से बाहर निकालनी पड़ती है। यह फेफड़ों की क्षमता, वायु प्रवाह और गैस एक्सचेंज को मापता है।

  • सटीक निदान: अस्थमा और सीओपीडी जैसी रुकावट वाली (ऑब्स्ट्रक्टिव) बीमारियों का पता लगाने में गोल्ड स्टैंडर्ड है। FEV1/FVC अनुपात से रुकावट की गंभीरता मापी जाती है।
  • बीमारी की गंभीरता का आकलन: फेफड़ों की क्षमता (FVC), एक सेकंड में निकाली जाने वाली हवा (FEV1) और अन्य पैरामीटर से बीमारी की स्टेज तय होती है।
  • उपचार की प्रभावशीलता की जांच: ब्रॉन्कोडाइलेटर (दवा) देने के बाद सुधार देखकर अस्थमा (रिवर्सिबल) और सीओपीडी (कम रिवर्सिबल) में अंतर पता चलता है।
  • लंबे समय तक मॉनिटरिंग: समय के साथ बीमारी की प्रगति या सुधार ट्रैक करने में उपयोगी।
  • पूर्व-सर्जरी मूल्यांकन: बड़े ऑपरेशन से पहले फेफड़ों की स्थिति जांचने के लिए जरूरी।
  • व्यावसायिक जोखिमों का आकलन: धूल, रसायन आदि से प्रभावित लोगों में फेफड़ों की क्षति का पता लगाना।

एफओटी (FOT) के मुख्य लाभ

एफओटी एक आधुनिक, गैर-आक्रामक तकनीक है जिसमें मरीज सामान्य सांस लेते रहता है और मशीन छोटी ध्वनि तरंगें (ऑसिलेशन) फेफड़ों में भेजकर प्रतिरोध (रेसिस्टेंस) और रिएक्टेंस मापती है। यह स्पाइरोमेट्री की तुलना में आसान है।

  • कम प्रयास की जरूरत: सामान्य सांस (टाइडल ब्रीदिंग) पर काम करती है, इसलिए बच्चों, बुजुर्गों, कमजोर मरीजों या जो स्पाइरोमेट्री नहीं कर पाते, उनके लिए आदर्श।
  • छोटी वायुमार्गों (स्मॉल एयरवेज) की बेहतर जांच: शुरुआती छोटी रुकावटों का पता लगाने में स्पाइरोमेट्री से अधिक संवेदनशील, खासकर गंभीर अस्थमा या सीओपीडी में।
  • केंद्रीय और परिधीय वायुमार्गों का अलग-अलग आकलन: फ्रीक्वेंसी के आधार पर बड़ा और छोटा रुकावट अलग करके बताती है।
  • ब्रॉन्कोडाइलेशन और हाइपररिस्पॉन्सिवनेस की जांच: दवा का प्रभाव या अस्थमा की संवेदनशीलता मापने में उपयोगी, बिना गहरी सांस की जरूरत।
  • लंबी अवधि की मॉनिटरिंग और अनुसंधान: आसान होने से बार-बार जांच संभव, और रिसर्च में नई ऊंचाइयां।
  • वेंटिलेटर पर मरीजों या नींद में जांच: स्पाइरोमेट्री की तुलना में अधिक लचीली।
Tech Insider: Forced Oscillation Technique | RT
FVC PFT system - PDD-301/so - Piston - PEF / forced oscillation ...

पीएफटी और एफओटी की तुलना में लाभ

  • पीएफटी पारंपरिक और व्यापक रूप से उपलब्ध है, लेकिन प्रयास-निर्भर होने से कुछ मरीजों में कठिन।
  • एफओटी प्रयास-स्वतंत्र है, छोटी रुकावटों को जल्दी पकड़ती है, और पूरक के रूप में उपयोगी।
  • दोनों साथ में इस्तेमाल करने से अधिक सटीक निदान संभव, जैसे बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज में शुरू हुई सुविधा से मरीजों को लाभ।
Pulmonary Function Tests (PFTs) - EMCrit Project

ये जांचें फेफड़ों की बीमारियों में समय पर इलाज शुरू करने और जीवन गुणवत्ता सुधारने में महत्वपूर्ण हैं। यदि आपको कोई लक्षण हैं, तो डॉक्टर से सलाह लें।

अस्थमा में पीएफटी (Pulmonary Function Test) का उपयोग

पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट (पीएफटी) मुख्य रूप से स्पाइरोमेट्री पर आधारित होता है, जो फेफड़ों की कार्यक्षमता का आकलन करता है। अस्थमा एक ऑब्स्ट्रक्टिव (रुकावट वाली) फेफड़ों की बीमारी है, जिसमें वायुमार्ग संकुचित हो जाते हैं। पीएफटी अस्थमा के निदान, गंभीरता निर्धारण, उपचार प्रभाव और मॉनिटरिंग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

अस्थमा के निदान में पीएफटी का उपयोग

  • वायु प्रवाह की रुकावट का पता लगाना: स्पाइरोमेट्री में FEV1 (एक सेकंड में बाहर निकाली गई हवा की मात्रा) और FVC (कुल बाहर निकाली गई हवा) मापे जाते हैं। अस्थमा में FEV1/FVC अनुपात कम (<70-80%) होता है, जो ऑब्स्ट्रक्टिव पैटर्न दिखाता है।
  • रिवर्सिबिलिटी टेस्ट (ब्रॉन्कोडाइलेटर रिस्पॉन्स): दवा (जैसे सैल्बुटामॉल) देने के बाद यदि FEV1 में 12% से अधिक और 200 ml से ज्यादा सुधार होता है, तो यह अस्थमा की पुष्टि करता है। यह अस्थमा को COPD से अलग करने में मदद करता है।
  • नॉर्मल स्पाइरोमेट्री होने पर: यदि शुरुआती टेस्ट नॉर्मल है लेकिन अस्थमा का संदेह है, तो ब्रॉन्कोप्रोवोकेशन टेस्ट (मेथाकोलिन चैलेंज) किया जाता है, जो वायुमार्ग की अतिसंवेदनशीलता दिखाता है।
Lung Function Tests to Diagnose Asthma | AAFA.org
Spirometry: Uses, Side Effects, Procedure, Results
Pulmonary Function Testing (Spirometry) | Allergy and Asthma ...

अस्थमा की गंभीरता और मॉनिटरिंग में उपयोग

  • बीमारी की गंभीरता का आकलन: FEV1 का प्रतिशत (% predicted) से अस्थमा की स्टेज (माइल्ड, मॉडरेट, सीवियर) तय होती है।
  • उपचार की प्रभावशीलता जांच: दवा शुरू करने के बाद और नियमित रूप से (हर 3-6 महीने या साल में एक बार) पीएफटी करके सुधार देखा जाता है।
  • लंबे समय की निगरानी: समय के साथ फेफड़ों की क्षति या प्रगति ट्रैक करने में उपयोगी, खासकर बच्चों और गंभीर अस्थमा में।
Asthma | Basicmedical Key
Pulmonary Function Testing (PFT) Made Simple | Iowa Head and Neck ...

पीएफटी कैसे किया जाता है?

मरीज माउथपीस से गहरी सांस लेकर तेजी से बाहर निकालता है। यह गैर-आक्रामक और सुरक्षित टेस्ट है, जो 15-30 मिनट लेता है।

VA TeleSpirometry: Dedicated to Veterans' Lung Health | Connected Care

अस्थमा के मरीजों को नियमित पीएफटी करवाना चाहिए, क्योंकि यह समय पर उपचार बदलने में मदद करता है। यदि लक्षण हैं (घरघराहट, सांस फूलना), तो डॉक्टर से सलाह लें। GINA और ATS गाइडलाइंस के अनुसार पीएफटी अस्थमा प्रबंधन का आधार है।

अस्थमा का घरेलू प्रबंधन: लक्षणों को नियंत्रित करने के प्रभावी तरीके

अस्थमा एक पुरानी बीमारी है जिसमें फेफड़ों की वायुमार्गों में सूजन और संकुचन होता है, जिससे सांस लेने में तकलीफ, घरघराहट, खांसी और सीने में जकड़न जैसे लक्षण होते हैं। इसे पूरी तरह ठीक नहीं किया जा सकता, लेकिन घरेलू प्रबंधन से लक्षणों को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। महत्वपूर्ण: ये उपाय डॉक्टर की सलाह और prescribed दवाओं (जैसे इनहेलर) के साथ ही अपनाएं। गंभीर अटैक में तुरंत मेडिकल मदद लें।

1. ट्रिगर्स (उत्तेजक कारकों) से बचाव – सबसे महत्वपूर्ण कदम

अस्थमा के अटैक मुख्य रूप से ट्रिगर्स से होते हैं। इन्हें पहचानें और दूर करें:

  • धूम्रपान और धुएं से दूर रहें: सिगरेट, बीड़ी, हुक्का या सेकंडहैंड स्मोक से बचें। घर में धूपबत्ती या अगरबत्ती कम जलाएं।
  • धूल और एलर्जेंस: घर में नियमित सफाई करें। बेडिंग, पर्दे और कार्पेट को हफ्ते में धोएं। एलर्जी-प्रूफ कवर का इस्तेमाल करें।
  • पालतू जानवर: अगर एलर्जी है तो पेट्स को बेडरूम से दूर रखें या बाहर।
  • कीड़े-मकोड़े: कॉकरोच या चूहों के लिए स्प्रे की बजाय जेल या ट्रैप इस्तेमाल करें।
  • मौसम और प्रदूषण: ठंडी हवा, पराग कण या प्रदूषित हवा में बाहर कम निकलें। मास्क पहनें।
  • अन्य: ठंडा खाना, तला-भुना, भावनात्मक तनाव या व्यायाम से ट्रिगर होने पर सावधानी बरतें।
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2. इनहेलर का सही उपयोग

घर पर अस्थमा का मुख्य प्रबंधन इनहेलर से होता है। रेस्क्यू इनहेलर (नीला) अटैक में तुरंत राहत देता है, जबकि प्रिवेंटर (भूरा/लाल) रोजाना सूजन कम करता है। डॉक्टर से सही तकनीक सीखें।

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3. सांस की एक्सरसाइज और योग

  • पर्स्ड लिप ब्रीदिंग: नाक से सांस लें, होंठ सिकुड़ाकर धीरे बाहर निकालें। इससे फेफड़े बेहतर काम करते हैं।
  • डायाफ्रामेटिक ब्रीदिंग: पेट से सांस लेने की प्रैक्टिस।
  • प्राणायाम: अनुलोम-विलोम, भस्त्रिका (डॉक्टर की सलाह से)। ये लक्षण कम करते हैं और फेफड़ों को मजबूत बनाते हैं।
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4. घरेलू उपाय (सहायक, वैज्ञानिक प्रमाण सीमित)

ये लक्षणों में राहत दे सकते हैं, लेकिन दवा की जगह नहीं लेते:

  • अदरक: अदरक की चाय में शहद मिलाकर पिएं। सूजन कम करता है।
  • शहद: गर्म पानी या चाय में मिलाकर। गले को आराम।
  • लहसुन: दूध में उबालकर पिएं।
  • तुलसी: पत्तियां चबाएं या चाय बनाएं।
  • भाप लेना: गर्म पानी की स्टीम (कभी-कभी यूकेलिप्टस ऑयल मिलाकर)। वायुमार्ग खोलती है।
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5. डाइट और लाइफस्टाइल टिप्स

  • विटामिन C, E और ओमेगा-3 युक्त भोजन: फल, हरी सब्जियां, नट्स।
  • मसालेदार, तला हुआ या ठंडा खाने से परहेज।
  • वजन नियंत्रित रखें, नियमित हल्का व्यायाम करें।
  • घर में नमी 30-50% रखें, मोल्ड से बचें।

(अस्थमा एक्शन प्लान बनाएं (डॉक्टर के साथ) और पीक फ्लो मीटर से मॉनिटरिंग करें। नियमित चेकअप जरूरी है। इन उपायों से ज्यादातर लोग सामान्य जीवन जी सकते हैं! यदि लक्षण बढ़ें तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।)

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News Desk

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