अतुल्य भारत चेतना (संवाददाता: अभिषेक शुक्ला)
कानपुर। विज्ञान की उस अटल सच्चाई को चुनौती देते हुए, जहां माना जाता है कि दुनिया में किसी भी दो व्यक्तियों के फिंगरप्रिंट और रेटिना पैटर्न कभी भी पूरी तरह समान नहीं हो सकते, कानपुर के नौबस्ता इलाके में रहने वाले पवन मिश्रा के जुड़वां बेटों प्रबल और पवित्र मिश्रा ने एक अभूतपूर्व मामला पेश किया है। इन दोनों भाइयों के बायोमेट्रिक डेटा – फिंगरप्रिंट और रेटिना स्कैन – में 100% समानता पाई गई है, जो वैज्ञानिक समुदाय के लिए एक बड़ी पहेली बन गई है। यह मामला भारत में अपनी तरह का पहला दर्ज उदाहरण माना जा रहा है, हालांकि इससे पहले केरल में भी एक समान घटना सामने आई थी। इस समानता के कारण दोनों भाइयों के आधार कार्ड अपडेट करने में गंभीर तकनीकी बाधाएं आ रही हैं, जो UIDAI (यूनिक आइडेंटिफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया) की बायोमेट्रिक सिस्टम की सीमाओं को उजागर कर रही हैं।
जुड़वां भाइयों की अनोखी कहानी
पवन मिश्रा के घर में जन्मे प्रबल और पवित्र मिश्रा एक जैसे दिखने वाले एक जैसे जुड़वां भाई हैं, जिन्हें मोनोजाइगोटिक ट्विन्स कहा जाता है। आमतौर पर ऐसे जुड़वां बच्चों में आनुवंशिक समानता तो होती है, लेकिन फिंगरप्रिंट और रेटिना (जो वास्तव में आईरिस पैटर्न को संदर्भित करता है) जैसे बायोमेट्रिक फीचर्स गर्भावस्था के दौरान पर्यावरणीय कारकों से प्रभावित होकर अलग-अलग विकसित होते हैं। हालांकि, इन भाइयों के मामले में जांच से पता चला कि उनके फिंगरप्रिंट और रेटिना स्कैन बिल्कुल ‘कॉपी-पेस्ट’ की तरह एक समान हैं। यह खोज तब हुई जब परिवार ने उनके आधार कार्ड अपडेट करने की कोशिश की। विशेषज्ञों का कहना है कि जुड़वां बच्चों में बायोमेट्रिक मैच 55% से 74% तक होना सामान्य है, लेकिन 100% समानता असंभव मानी जाती रही है। इस वजह से यह मामला अब वैश्विक स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है और बायोमेट्रिक पहचान प्रणाली पर नए शोध को बढ़ावा दे रहा है।
आधार कार्ड अपडेट में आ रही तकनीकी समस्या
इस अनोखी समानता ने UIDAI की बायोमेट्रिक सिस्टम को भ्रमित कर दिया है। जब प्रबल या पवित्र में से किसी एक के आधार कार्ड के लिए बायोमेट्रिक डेटा अपलोड किया जाता है, तो सिस्टम इसे दूसरे भाई के डेटा से मैच मानकर स्वचालित रूप से दूसरे का आधार कार्ड निष्क्रिय कर देता है। परिवार के अनुसार, यह समस्या कई बार दोहराई गई है, जिससे दोनों भाइयों के लिए एक वैध आधार कार्ड बनाना मुश्किल हो गया है। आधार कार्ड आज भारत में पहचान का सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज है, जो बैंकिंग, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और सरकारी योजनाओं के लिए अनिवार्य है। इस समस्या के कारण मिश्रा परिवार को रोजमर्रा की जिंदगी में असुविधा का सामना करना पड़ रहा है। UIDAI के अधिकारियों ने इस मामले की जांच शुरू कर दी है, लेकिन अभी तक कोई स्थायी समाधान नहीं निकाला जा सका है।
विशेषज्ञों की राय और वैज्ञानिक निहितार्थ
विशेषज्ञ इस मामले को बायोमेट्रिक तकनीक की सीमाओं का एक जीवंत उदाहरण मान रहे हैं। डॉ. राहुल देव, एक प्रोफेसर और बायोमेट्रिक विशेषज्ञ, ने कहा, “यह मामला जिज्ञासा का विषय है और बायोमेट्रिक यूनिकनेस की धारणाओं को चुनौती देता है।” वहीं, UIDAI के महानिदेशक प्रशांत कुमार सिंह ने बताया कि बायोमेट्रिक तकनीक ने अब तक 350 से अधिक लापता बच्चों को उनके परिवारों से मिलाने में मदद की है, लेकिन ऐसे दुर्लभ मामलों से इसकी कमजोरियां भी सामने आती हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि आईरिस पैटर्न (जिसे अक्सर रेटिना कहा जाता है) जुड़वां बच्चों में बहुत समान हो सकता है क्योंकि यह आनुवंशिक रूप से निर्धारित होता है, लेकिन फिंगरप्रिंट गर्भ में यादृच्छिक कारकों से बनते हैं और आमतौर पर अलग होते हैं। इस मामले ने जुड़वां बच्चों पर नए शोध को प्रेरित किया है, जो भविष्य में बायोमेट्रिक सिस्टम को और मजबूत बनाने में मदद कर सकता है।
संबंधित मामला: केरल का 2019 उदाहरण
यह पहला मामला नहीं है जब जुड़वां बच्चों के बायोमेट्रिक ने सिस्टम को चकमा दिया हो। 2019 में केरल के कोट्टायम जिले के थालयोलापरंबु में रहने वाले जयकुमार और जेनी के जुड़वां बेटों अभिजीत और अभिनव के साथ भी ऐसी ही घटना हुई थी। अभिजीत का आधार कार्ड पहले बन गया था, लेकिन जब अभिनव का आवेदन किया गया, तो सिस्टम ने कहा कि समान रेटिना और फिंगरप्रिंट वाला व्यक्ति पहले से रजिस्टर्ड है। दोनों बच्चे दिखने में एक जैसे नहीं थे, लेकिन उनके बायोमेट्रिक डेटा में समानता थी। जयकुमार, जो सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में कर्मचारी हैं, ने भविष्य में आधार से जुड़ी समस्याओं पर चिंता जताई थी। यह मामला भी अक्षय केंद्र पर सामने आया था और तब से बायोमेट्रिक तकनीक में सुधार की मांग की थी।
विज्ञान और तकनीक की नई दिशा
प्रबल और पवित्र मिश्रा का यह मामला न केवल विज्ञान की स्थापित धारणाओं को चुनौती दे रहा है, बल्कि आधार जैसी राष्ट्रीय पहचान प्रणाली की मजबूती पर भी सवाल उठा रहा है। UIDAI अब ऐसे दुर्लभ मामलों के लिए विशेष प्रोटोकॉल विकसित करने पर विचार कर रही है, जैसे अतिरिक्त पहचान प्रमाण या मैनुअल वेरिफिकेशन। वैज्ञानिक समुदाय इसे एक अवसर के रूप में देख रहा है, जो बायोमेट्रिक रिसर्च को नई ऊंचाइयों पर ले जा सकता है। मिश्रा परिवार उम्मीद कर रहा है कि जल्द ही इस समस्या का समाधान निकलेगा, ताकि उनके बच्चे सामान्य जीवन जी सकें। यह घटना हमें याद दिलाती है कि प्रकृति कभी-कभी विज्ञान की किताबों को भी फिर से लिखने पर मजबूर कर देती है।

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