अतुल्य भारत चेतना (संवाददाता – जितेंद्र कुमार)
जयपुर/राजस्थान। राजस्थान की राजधानी जयपुर में देहदान (शरीर दान) को लेकर लोगों में जागरूकता तेजी से बढ़ रही है। विशेष रूप से सवाई मानसिंह (एसएमएस) मेडिकल कॉलेज जैसे प्रमुख संस्थानों में यह बदलाव साफ दिखाई दे रहा है। पिछले 37 वर्षों में एसएमएस मेडिकल कॉलेज को 344 देहदान प्राप्त हुए हैं, जबकि वर्ष 2025 में अब तक 30 देहदान हो चुके हैं। यह आंकड़े बताते हैं कि लोग मृत्यु के बाद अपने शरीर को मेडिकल छात्रों की शिक्षा और अनुसंधान के लिए दान करने को एक पुनीत कार्य मानने लगे हैं।
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जागरूकता बढ़ने के प्रमुख कारण
देहदान की बढ़ती संख्या के पीछे कई सकारात्मक कारण हैं:
- मानवीय योगदान की समझ: लोग अब यह महसूस कर रहे हैं कि जीवन के बाद शरीर दान करना मानवता की सेवा का एक बड़ा और सम्मानजनक माध्यम है। इससे मेडिकल छात्रों को मानव शरीर रचना (एनाटॉमी) की गहन समझ मिलती है, जो बेहतर चिकित्सकों के निर्माण में सहायक होती है।
- पारिवारिक संकल्प: कई व्यक्ति जीते जी देहदान का संकल्प लेते हैं और उनके परिजन मृत्यु के बाद इस इच्छा को पूरा करते हैं। उदाहरणस्वरूप, हाल ही में 85 वर्षीय लक्ष्मी सेवानी ने ऐसा संकल्प लिया था, जिसे उनके परिवार ने सम्मानपूर्वक पूरा किया।
- संस्थानों का सक्रिय सहयोग: एसएमएस मेडिकल कॉलेज, निम्स यूनिवर्सिटी और जैन सोशल ग्रुप सेंट्रल जैसे संस्थान देहदान को प्रोत्साहित कर रहे हैं। ये संस्थान परिवारों को प्रक्रिया में पूरा सहयोग प्रदान करते हैं, जिससे दान की औपचारिकताएं आसान हो गई हैं।
- संख्या में सतत वृद्धि: पहले जहां मेडिकल कॉलेजों में शवों की कमी एक बड़ी समस्या थी, वहीं अब हर महीने कई देहदान हो रहे हैं। यह बदलाव जागरूकता अभियानों का सकारात्मक परिणाम है।
देहदान क्यों है आवश्यक?
देहदान मेडिकल शिक्षा की रीढ़ है। मेडिकल छात्रों को मानव शरीर की जटिल संरचना समझाने के लिए व्यावहारिक अध्ययन अनिवार्य होता है। देहदान से प्राप्त शव इस कमी को दूर करते हैं और छात्रों को वास्तविक अनुभव प्रदान करते हैं। जयपुर में लोग अब इसे एक सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में देख रहे हैं, जिससे चिकित्सा क्षेत्र में गुणवत्ता बढ़ रही है।
संगठनात्मक प्रयास और जन जागरूकता
- दधीचि देहदान समिति जैसी संस्थाएं देहदान और अंगदान को बढ़ावा देने के लिए निरंतर कार्यरत हैं। ये संगठन नेशनल कॉन्क्लेव जैसे बड़े आयोजन कर समाज में जागरूकता फैला रहे हैं।
- लोगों द्वारा जीते जी संकल्प लेने और परिजनों द्वारा अंतिम इच्छा पूरी करने के मामले बढ़ रहे हैं, जो आम जनता में सकारात्मक संदेश दे रहे हैं।
चुनौतियां अभी भी बाकी
बढ़ती जागरूकता के बावजूद कुछ चुनौतियां विद्यमान हैं:
- शवों का सम्मान और व्यवस्था: देहदानियों की संख्या बढ़ने पर भी उनके शवों को वह पूर्ण गरिमा और सम्मान नहीं मिल पाता, जिसके वे हकदार हैं। उचित संरक्षण और व्यवस्था की कमी एक बड़ी समस्या बनी हुई है।
- अन्य बाधाएं: कभी-कभी औपचारिकताएं, पारिवारिक परंपराएं या जानकारी की कमी बाधा बनती हैं।
कुल मिलाकर, जयपुर में देहदान को लेकर सकारात्मक रुझान मजबूत हो रहा है। विभिन्न संगठन, संस्थान और व्यक्ति मिलकर इस नेक कार्य को आगे बढ़ा रहे हैं। यदि यह प्रयास निरंतर जारी रहा, तो निकट भविष्य में मेडिकल शिक्षा और अनुसंधान को और मजबूती मिलेगी। समाज से अपील है कि अधिक से अधिक लोग देहदान का संकल्प लें और इस पुनीत कार्य में योगदान दें।

