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चौरागढ़ महादेव के पीठाधीश परम पूज्य गरीब दास जी महाराज ब्रह्मलीन, क्षेत्र में शोक की लहर

महादेव चौरागढ़ में गुरुवार को 12:00 तक होंगे परम पूज्य गरीब दास जी महाराज के अंतिम दर्शन

क्षेत्र के बंटी महाराज और पार्षद राजकुमार बरकड़े ने दी जानकारी; लाखों भक्तों में दुख की छाया

अतुल्य भारत चेतना (अभिषेक सोनी)

छिंदवाड़ा/पचमढ़ी: सतपुड़ा की हरी-भरी वादियों में बसे आस्था के प्रमुख केंद्र चौरागढ़ महादेव मंदिर के पीठाधीश और प्रख्यात संत 1008 परम पूज्य गरीब दास जी महाराज (जिन्हें गरीब दास बाबा या बाबा गरीबदास के नाम से भी जाना जाता है) का बुधवार को निधन हो गया। वे लगभग 90 वर्ष के थे और लंबे समय से स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे थे। उनके ब्रह्मलीन होने की खबर से पूरे छिंदवाड़ा जिले, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र सहित देशभर में फैले लाखों भक्तों में शोक की लहर दौड़ गई है।

परम पूज्य गरीब दास जी महाराज केवल एक संत नहीं थे, बल्कि तपस्या, त्याग और भक्ति का जीवंत प्रतीक थे। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन भगवान शिव की आराधना, कठिन तप और दीन-दुखियों की सेवा में समर्पित कर दिया। चौरागढ़ की ऊंची चोटियों (लगभग 1326 मीटर की ऊंचाई पर) पर निवास करते हुए उन्होंने एकांत साधना की, जो भक्तों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी। वे सिद्ध तपस्वी के रूप में जाने जाते थे और चौरागढ़ महादेव मंदिर के विकास तथा सामाजिक कार्यों में उनका योगदान अविस्मरणीय रहा है। मंदिर में त्रिशूल चढ़ाने की परंपरा को जीवित रखने और शिव भक्ति की ज्योति प्रज्वलित करने में उनकी भूमिका प्रमुख रही। प्रमुख संतों, साधकों और तीर्थयात्रियों सहित बड़ी हस्तियां उन्हें अपना गुरु मानती थीं।

निधन की पुष्टि पचमढ़ी तहसीलदार वैभव बैरागी ने की है। खबर फैलते ही भक्त पचमढ़ी और मठ परिसर की ओर उमड़ पड़े, जहां हर कोई अपने गुरु के अंतिम दर्शन के लिए व्याकुल नजर आ रहा है। छिंदवाड़ा सांसद विवेक बंटी साहू ने गहरा दुख व्यक्त करते हुए कहा, “महाराज जी के समाधि लेने का समाचार अत्यंत दुखद है। छिंदवाड़ा, पांढुर्णा और महाराष्ट्र में उनके लाखों शिष्य हैं। यह मेरी व्यक्तिगत क्षति है।”

महादेव चौरागढ़ के बंटी महाराज और अमरवाड़ा के पार्षद राजकुमार बरकड़े ने जानकारी देते हुए बताया कि परम पूज्य गरीब दास जी महाराज के पंचतत्व में विलीन होने से पूरे क्षेत्र में शोक व्याप्त है, लेकिन यही जीवन का अंतिम सत्य है। उन्होंने कहा कि पूज्य महाराज के अंतिम दर्शन गुरुवार (08 जनवरी 2026) को दोपहर 12:00 बजे तक महादेव चौरागढ़ में उपलब्ध होंगे। इसके बाद विधि-विधान के साथ अंतिम संस्कार की संपूर्ण क्रियाएं संपन्न की जाएंगी। तहसीलदार बैरागी ने भी पुष्टि की कि अंतिम संस्कार के समय और कार्यक्रम की आधिकारिक जानकारी जल्द जारी की जाएगी।

चौरागढ़ महादेव मंदिर, जो सतपुड़ा की वादियों में स्थित है, क्षेत्रवासियों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। यहां हर वर्ष हजारों भक्त त्रिशूल चढ़ाने और दर्शन के लिए पहुंचते हैं। गरीब दास जी महाराज की साधना ने इस स्थान को और अधिक पवित्र बना दिया। उनके निधन पर संत समाज, भक्तों और स्थानीय नागरिकों ने आंसूभरी श्रद्धांजलि दी। एक रिपोर्ट में कहा गया है, “शांत हो गया सतपुड़ा का वह स्वर, जो हर पल ‘हर-हर महादेव’ जपता था। बाबा का भौतिक शरीर भले ही हमारे बीच न हो, लेकिन उनकी दी हुई शिक्षाएं और चौरागढ़ की चोटियों पर गूंजता उनका नाम सदैव अमर रहेगा।”

ईश्वर से प्रार्थना है कि पुण्यात्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान प्रदान करें और उनके अनुयायियों को यह दुख सहने की शक्ति दें।

चौरागढ़ महादेव मंदिर का इतिहास और महत्व

चौरागढ़ महादेव मंदिर (जिसे छोटा महादेव या चौड़ेश्वर महादेव मंदिर भी कहा जाता है) मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम (पूर्व होशंगाबाद) जिले में स्थित पचमढ़ी हिल स्टेशन की सतपुड़ा पर्वत श्रृंखला में एक प्रमुख शिव मंदिर है। यह मंदिर समुद्र तल से लगभग 1,326 से 1,330 मीटर की ऊंचाई पर चौरागढ़ शिखर पर स्थित है, जो सतपुड़ा की तीसरी सबसे ऊंची चोटी है। घने जंगलों और हरी-भरी घाटियों से घिरा यह स्थान आस्था और प्राकृतिक सौंदर्य का अनोखा संगम है।

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सतपुड़ा का अद्भुत आस्था केंद्र ...

पौराणिक कथाएं और इतिहास

मंदिर का इतिहास पौराणिक काल से जुड़ा माना जाता है और कई युगों पुराना बताया जाता है। इससे मुख्य दो किंवदंतियां जुड़ी हुई हैं:

  1. भस्मासुर से बचाव की कथा: एक प्रचलित मान्यता के अनुसार, राक्षस भस्मासुर को भगवान शिव से वरदान मिला था कि वह जिसके सिर पर हाथ रखेगा, वह भस्म हो जाएगा। भस्मासुर ने इस शक्ति का परीक्षण स्वयं शिव जी पर करना चाहा, जिससे बचने के लिए भगवान शिव सतपुड़ा की इन पहाड़ियों में शरण लेने आए थे। यहां उन्होंने छिपकर भस्मासुर का पीछा काटा। बाद में भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर भस्मासुर का वध किया।
  2. चोरा बाबा और त्रिशूल की परंपरा: दूसरी कथा चोरा बाबा (एक तपस्वी) से जुड़ी है। चोरा बाबा ने यहां कठोर तपस्या की, जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और अपना त्रिशूल इसी स्थान पर छोड़कर अंतर्ध्यान हो गए। तभी से यहां त्रिशूल चढ़ाने की परंपरा शुरू हुई। मंदिर परिसर में हजारों त्रिशूल जमा हैं, जो भक्तों द्वारा मनोकामना पूर्ति पर चढ़ाए जाते हैं। कुछ त्रिशूल कई क्विंटल भारी और 15 फीट ऊंचे होते हैं।

मंदिर तक पहुंचने के लिए महादेव गुफा से लगभग 1,300-1,400 कठिन सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं या 3-4 किमी का ट्रेक करना होता है। यह यात्रा भक्तों के लिए तपस्या का प्रतीक है।

Climb to Chauragarh Temple
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महत्व और उत्सव

  • उज्जैन के महाकाल और ओंकारेश्वर के बाद मध्य प्रदेश में महाशिवरात्रि का सबसे बड़ा और अनोखा मेला यहीं लगता है। हर साल फाल्गुन मास में लाखों भक्त (मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात आदि से) त्रिशूल लेकर आते हैं।
  • मंदिर में प्राकृतिक शिवलिंग है और परिसर में धर्मशाला तथा तालाब भी है।
  • यह स्थान पचमढ़ी बायोस्फियर रिजर्व का हिस्सा है, जहां पांडवों के निर्वासित काल में गुफाओं में रहने की भी मान्यता है।

चौरागढ़ महादेव मंदिर न केवल धार्मिक महत्व का केंद्र है, बल्कि अपनी दुर्गम यात्रा और मनोरम दृश्यों के कारण पर्यटकों को भी आकर्षित करता है। यहां सूर्योदय-सूर्यास्त का नजारा अविस्मरणीय होता है। यह सतपुड़ा की रानी पचमढ़ी की सबसे प्रमुख आस्था स्थली है।

हर हर महादेव!

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News Desk

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