रिपोर्टर: रेखा कुमावत (लोहागल, अजमेर, राजस्थान)
अजमेर की पवित्र दरगाह शरीफ में चल रहे सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के 814वें सालाना उर्स के दौरान केंद्र सरकार की ओर से एक महत्वपूर्ण परंपरा निभाई जा रही है। केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की ओर से कल, 23 दिसंबर को मखमली चादर पेश की जाएगी, जो देश में अमन-चैन और खुशहाली की दुआ का प्रतीक होगी। यह चादर अजमेर दरगाह कमेटी के पूर्व उपाध्यक्ष मुन्नवर खान द्वारा सौंपी गई है, जिन्हें रक्षा मंत्री ने अपने दिल्ली आवास पर यह जिम्मेदारी दी।
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ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती, जिन्हें गरीब नवाज के नाम से भी जाना जाता है, 12वीं-13वीं शताब्दी के प्रमुख सूफी संत थे, जिन्होंने भारत में सूफीवाद की नींव रखी। उनकी दरगाह अजमेर में स्थित है, जो हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक मानी जाती है। उर्स, जो उनकी पुण्यतिथि पर मनाया जाता है, हर साल लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। इस वर्ष का 814वां उर्स 17 दिसंबर 2025 से शुरू हुआ है और यह इस्लामिक कैलेंडर के रजब माह के अनुसार आयोजित किया जा रहा है। उर्स के दौरान विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं, जिसमें कव्वाली, लंगर और दुआएं प्रमुख हैं।
मुन्नवर खान, जो दरगाह कमेटी के पूर्व उपाध्यक्ष हैं, ने बताया कि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने उन्हें दिल्ली में बुलाकर चादर सौंपी। खान कल दरगाह पहुंचकर हाजिरी लगाएंगे और रक्षा मंत्री की ओर से मखमली चादर के साथ अकीदत के फूल पेश करेंगे। इस दौरान वे देश में शांति, समृद्धि और भाईचारे की दुआ मांगेंगे। यह परंपरा लंबे समय से चली आ रही है, जहां भारत सरकार के उच्च अधिकारी और राजनेता उर्स के अवसर पर चादर भेजकर सूफी संत के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं। उदाहरण के लिए, हाल के वर्षों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अन्य मंत्रियों ने भी चादर पेश की है।
इस वर्ष के उर्स में विभिन्न राज्यों से श्रद्धालु पहुंच रहे हैं, और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं। दरगाह कमेटी ने बताया कि उर्स के दौरान कोविड-19 प्रोटोकॉल का पालन किया जा रहा है, हालांकि महामारी के बाद श्रद्धालुओं की संख्या में वृद्धि देखी गई है। मुन्नवर खान की यह भूमिका न केवल धार्मिक महत्व रखती है, बल्कि यह भारत की बहुलवादी संस्कृति को भी दर्शाती है, जहां राजनीतिक नेता धार्मिक सद्भाव को बढ़ावा देते हैं।
उर्स का समापन चंद दिनों में होगा, लेकिन चादर पेश करने की यह घटना उर्स की प्रमुख आकर्षणों में से एक होगी। स्थानीय निवासियों और श्रद्धालुओं का कहना है कि ऐसी परंपराएं देश में एकता और शांति का संदेश देती हैं।

