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ड्यूटी निभाते हुए आरक्षक महेश पाठक ने दी जान, शहीद का दर्जा देने की माँग ने पकड़ा जोर न्यू बस स्टैंड हादसे के बाद आक्रोश, मुख्यमंत्री को ज्ञापन, परिवहन और यातायात व्यवस्था कठघरे में

शहडोल जिले के इतिहास में 7 दिसंबर का दिन एक काले अध्याय के रूप में दर्ज हो गया, जब न्यू बस स्टैंड में ड्यूटी के दौरान आरक्षक क्रमांक-98 महेश पाठक ने कर्तव्य निभाते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। अव्यवस्थित यातायात और लापरवाह बस संचालन के बीच बस की चपेट में आने से हुई इस दर्दनाक मौत ने पूरे जिले को शोक और आक्रोश में डुबो दिया है।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, न्यू बस स्टैंड के अत्यधिक भीड़भाड़ वाले क्षेत्र में आरक्षक महेश पाठक यातायात नियंत्रण की जिम्मेदारी निभा रहे थे। इसी दौरान तेज और लापरवाही से पीछे आ रही बस ने उन्हें कुचल दिया, जिससे उनकी मौके पर ही मौत हो गई। हादसे के बाद बस स्टैंड पर अफरा-तफरी मच गई और आम नागरिकों में गहरा आक्रोश देखने को मिला।

मुख्यमंत्री तक पहुँची शहीद का दर्जा देने की मांग घटना के बाद विभिन्न सामाजिक संगठनों, व्यापारियों और आम नागरिकों ने एकजुट होकर मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में आरक्षक महेश पाठक को शहीद का दर्जा देने, बस चालक एवं वाहन मालिक के विरुद्ध कठोरतम कार्यवाही करने, शहडोल बस स्टैंड का नाम उनके नाम पर करने तथा बस स्टैंड परिसर के उद्यान में उनकी स्मृति में प्रतिमा स्थापित किए जाने की पुरजोर मांग की गई है।

परिवार को मिले शहीद का सम्मान और सुविधाएँ ज्ञापन में यह भी कहा गया है कि आरक्षक महेश पाठक ने पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ अपनी सेवाएँ दीं। ड्यूटी के दौरान प्राण गंवाने वाले कर्मठ प्रहरी को शहीद का दर्जा मिलना चाहिए और शासन द्वारा शहीदों को दी जाने वाली सभी आर्थिक एवं सामाजिक सुविधाएँ उनके परिजनों को तत्काल प्रदान की जाएँ, ताकि परिवार को इस असहनीय पीड़ा के साथ आर्थिक संकट का सामना न करना पड़े।

अव्यवस्थित बस स्टैंड बना मौत का कारण न्यू बस स्टैंड वर्षों से अव्यवस्थित यातायात, बिना तय स्टॉपेज, बेतरतीब पार्किंग और बसों की मनमानी का गवाह रहा है। आरक्षक महेश पाठक की मौत ने इन खामियों को उजागर कर दिया है। अब जनता सवाल उठा रही है कि यदि समय रहते यातायात और परिवहन व्यवस्था सुधारी जाती, तो शायद एक ईमानदार पुलिसकर्मी की जान बचाई जा सकती थी।

जिले में शोक व आक्रोश

घटना के बाद जिलेभर में शोक की लहर है। हर वर्ग के लोग आरक्षक महेश पाठक की शहादत को नमन कर रहे हैं और मांग कर रहे हैं कि यह हादसा केवल एक “दुर्घटना” न बनकर रह जाए, बल्कि इससे सबक लेते हुए दोषियों पर कड़ी कार्रवाई और व्यवस्था में ठोस सुधार किया जाए।

अब सबकी निगाहें शासन के फैसले पर टिकी हैं कि क्या कर्तव्य पर जान गंवाने वाले आरक्षक महेश पाठक को शहीद का दर्जा और उनके परिवार को न्याय मिल पाएगा या नहीं।

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अनिल पाण्डेय

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