अतुल्य भारत चेतना
प्रमोद कश्यप
रतनपुर/छत्तीसगढ़। राण विद्या महर्षियों का सर्वस्व है। यह वह अटूट खजाना है, जिसके प्रभाव से अनेक प्रकार की दरिद्रताओ का शिकार बनकर भी भारत आज धनी हैं। आज भी संसार की सभ्य जातियों के समक्ष यह अपना मस्तक ऊंचा रख सकता है।

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इक्कीसवी शताब्दी विज्ञान का चरम कहीं जा सकती है, किंतु जितने विज्ञान आज तक उच्च भूमिका में पहुंच चुके हैं, जितने अभी अधूरे हैं तथा जो अभी गर्भ में ही है, उनमें से एक भी ऐसा नहीं है, जिसके संबंध में पुराणों में कोई भी उल्लेख न मिलता हो। जितने भी सामाजिक और राजनीतिक वाद इस समय भूमंडल में प्रसिद्ध है , उनमें से भी किसी का संक्षेप से, किसी का विस्तार से, किसी का पूर्वपक्ष रुप से और किसी का निंदा रुप से किसी न किसी प्रकार से पुराणों में अवश्य उल्लेख मिलेगा। आज से हजारों वर्ष पूर्व इन सब बातों का हमारे पूर्वजों को ज्ञान था, वे इन सबकी आलोचना कर सकते थे, प्रत्यक्षदर्शी की तरह सब बातों पर अपनी राय दे सकते थे । पुराण विद्या के समान कोई विद्या संसार के और किसी जाति के पास नहीं है।इस प्रकार की विद्या को अपने कोष में रखकर हिंदू जाति गौरवान्वित है।

पुराण अठारह है- यह प्रसिद्ध बात है। वस्तुत: ये अठारह स्वतंत्र पुराण नहीं है, किंतु एक ही पुराण के अठारह प्रकरण है। जैसे एक ग्रंथ में कई अध्याय होते हैं, वैसे ही एक पुराण के ये अठारह अध्याय है। यही कारण है कि उनका क्रम नियत है। स्वतंत्र ग्रंथो में कोई नियत क्रम नहीं रहता, वक्ता की इच्छा है कि उन्हें अपने व्याख्यान या लेख में किसी भी क्रम से आगे पीछे रख दें, किंतु पुराणों में ऐसा नहीं हो सकता। उनका एक नियत क्रम है। सप्तम पुराण कहने से मार्कण्डेय पुराण का ही बोध होगा , त्रयोदश पुराण कहने से स्कंद पुराण ही समझा जायेगा। पुराण सृष्टि विद्या है , जो ब्रह्म से आरंभ कर ब्रम्हाण्ड तक हमारे ज्ञान को पहुंचा देती है और आदि, मध्य एवं अंत में ब्रम्ह का कीर्तन करती हुई ब्रम्ह पर से ज्ञानी को विचलित नहीं होने देती।

यथा-
सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशों मन्वन्तराणि च।
वंशानुचरितं चैन पुराणों पंचलक्ष्णम।।
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