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मात्र गुरू व परमात्मा को नहीं, उनकी मानने में ही कल्याण होगा – हरि चैतन्य पुरी महाराज

मात्र गुरू व परमात्मा को नहीं, उनकी मानने में ही कल्याण होगा – हरि चैतन्य पुरी महाराज

संवाददाता मनमोहन गुप्ता भरतपुर

डीग – डीग जिले के कस्बा कामां तीर्थराज विमल कुण्ड स्थित हरि कृपा आश्रम के संस्थापक एवं हरि कृपा पीठाधीश्वर व विश्व विख्यात संत स्वामी हरि चैतन्य पुरी ने यहाँ हरि कृपा आश्रम में उपस्थित विशाल भक्त समुदाय को संबोधित करते हुए कहा कि सत्संग का प्रकाश हमारे अंतर्मन को प्रकाशित करता है और हमें भी उस ज्ञान रूपी प्रकाश को अपने अंतर मन में धारण कर परमपिता परमेश्वर को पाने का प्रयास करना चाहिए। मगर जब तक सत्य का संग नहीं होगा सत्संग से भी कोई लाभ प्राप्त हो नहीं सकेगा। जिस प्रकार सूरज की किरणें हमें तब तक लाभ नहीं पहुंचा सकती जब तक कि हमारे घरों की खिड़की दरवाजे बंद रहेंगे। ठीक उसी प्रकार हम गुरु व परमात्मा की कृपा के अधिकारी तभी बन सकते हैं जबकि हम उनके द्वारा दिए गए ज्ञान रूपी प्रकाश को अपने अंतर्गत में उतारेंगे।

उन्होंने कहा कि दृढ़ता, संयम, त्याग व तद्नुकुल आचरण इन चारों के एकत्रित होने पर ही सफलता प्राप्त होती है। योग्यता से अधिक महत्वकांक्षी नहीं होना चाहिए। कामनाओं को सीमित करें इनका कोई अंत नहीं। यह हृदय को पीड़ित करती हैं। सच्चा भाव ही सच्ची उपासना है। सच्चे हृदय से प्रेम व श्रद्धा पूर्वक की गई प्रार्थना को परमात्मा अवश्य ही सुनते हैं। चाहे व्यक्ति को वेद, शास्त्र, पुराणों का ज्ञान चाहे ना हो। आज हमारी, हमारे परिवार की देश की व समाज की जो दुर्दशा हो रही है विभिन्न प्रयास करने के बावजूद जिससे हम उबर नहीं पा रहे। प्रयास के साथ-साथ

प्रभु से उनकी कृपा की याचना से परिपूर्ण भाव सहित प्रार्थना भी करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि सच्चा संत व महात्मा न तो अपने को संत और महात्मा मानता है ना घोषित करता है, और ना दूसरों के द्वारा कहे जाने पर उसे स्वीकार करता है। विनम्र या नम्रता की दृष्टि से नहीं, वह सर्वत्र भगवान की महिमा को देखते हैं और उसी में सहज स्थित रहता है, वह त्याग का भी त्यागी होता है, किसी प्रकार के गर्प, दर्प, अभिमान उसके पास फटक नहीं सकते। साधु का वेष बनाकर भी समाज को धोखा देना महापाप है। उन्होंने कहा कि

जगत की यथासामर्थ्य सेवा तथा परमात्मा व संतों से प्रेम करो। संतो, शास्त्रों व अवतारों को मात्र अपनी कमियां छुपाने की ढाल ही ना बनाएं उनसे प्रेरणा शिक्षाएं उपदेश भी ग्रहण करके अपने जीवन में उतारे। उन्होंने कहा कि अधर्माचरण करने वाले कुमार्गगामी लोगों का संग त्यागकर, जितेंद्रिय, श्रेष्ठ महापुरुषों का संग व उनकी सेवा करके अपने जीवन को कल्याणमय बनाएं। क्योकि सत्पुरुषों का आचरण व कार्य सदैव अनुकरणीय होता है। अपने धारा प्रवाह प्रवचनों से उन्होंने सभी भक्तों को मंत्रमुग्ध व भाव विभोर कर दिया। सारा वातावरण भक्तिमय हो उठा व हृश्री गुरु महाराजह्व हृकामां के कन्हैयाहृव हृलाठी वाले भैय्याह्न की जय जयकार से गूंज उठा। आज श्री महाराज जी ने बी.एल.ओ रंजीत सिंह का सम्मान करते हुए सबका आवाहन किया कि कार्यभार की अधिकता के कारण जिस स्थिति में बी.एल.ओ हैं उनका सहयोग व सम्मान करें। श्री महाराज जी का कामवन के विभिन्न संगठनों ने स्वागत व सम्मान किया। आज भी दिनभर आश्रम में श्रद्धालुओं का ताँता लगा रहा ।

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मनमोहन गुप्ता

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