सच्चा सुख, आनंद, शाति एकमात्र परमात्मा व अध्यात्म की शरण में है – हरि चैतन्य पुरी
संवाददाता मनमोहन गुप्ता भरतपुर
इसे भी पढ़ें (Read Also): घोसी यादव समाज व शोषित पीड़ित, वंचित समाज की आवाज बनकर उनके हक के लिए संघर्ष करेगी सर्वजन सुखाय पार्टी: राष्ट्रीय अध्यक्ष
डीग – कामां प्रेमावतार, युगदृष्टा, हरि कृपा पीठाधीश्वर व विश्व विख्यात संत हरि चैतन्य पुरी महाराज ने आज यहाँ हरि कृपा आश्रम में उपस्थित विशाल भक्त समुदाय को संबोधित करते हुए कहा कि परमात्मा एक ही है। उनके नाम उपासना पद्धतियां विभिन्न हो सकती हैं। हम सभी एक ही सर्वशक्तिमान की संतान हैं जो जीव मात्र का परम सुहृदय हितैषी है। परमात्मा किसी से भी दूर नहीं है, लेकिन स्वार्थ के दलदल में फंसे इंसान की गति ऐसी है कि वह अपने भीतर स्थित परमात्मा को नहीं पहचान पा रहा है। सत्य को पहचानना, धर्म को पहचानना, दया को अपनाना, शांति मार्ग का चयन करना व क्षमादान में निपुणता ही परमात्मा का सत्य रूप है। सच्चा सुख आनंद व शाति एकमात्र परमात्मा व अध्यात्म की शरण में ही है। परमात्मा से प्रेम, समाज की सेवा व स्वयं की खोज करें। जो प्रभु समर्पित होकर अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं उनकी हर प्रकार से देखभाल व रक्षा स्वयं प्रभु करते हैं। लौकिक उन्नति बुरी नहीं, लेकिन प्रभु से विमुख उन्नति अवनति के समान ही है।
उन्होंने कहा कि मत, पंथ व संप्रदाय विभिन्न हो सकते हैं लेकिन धर्म एक ही है जो हमें राष्ट्रीयता, नैतिकता, मानवता व पारसस्परिक सौहार्द का संदेश देता है। जो आपस में लड़ना सिखाएं या हिंसा का संदेश दे वो धर्म नहीं हो सकता। धर्म जोड़ता है तोड़ता नहीं । लेकिन दुर्भाग्यवश आज लोग धर्म के नाम पर तोड़ने की कोशिश
एवं कर रहे हैं, व तोड़ रहे हैं जो शर्मनाक है। धर्म विज्ञान सम्मत है ढकोसला नहीं। धर्म व विज्ञान एक दूसरे के पूरक हैं कहना भी अतिश्योक्ति नहीं। धर्म से विज्ञान दूर होने पर ही ढोंग, पाखंड, अन्धविश्वास रूढिवादिताओं को बढ़ावा मिलता है। धर्म विहीन विज्ञान भी विकास का नहीं विनाश का कारण बनेगा। आज धर्म के अनुष्ठान बहुत बढ़ रहे हैं लेकिन आचरण अपेक्षाकृत उतना नहीं बढ़ रहा जबकि धर्म मात्र अनुष्ठान का नहीं अपितु आचरण का विषय है। जीवन का अभिन्न अंग बन जाए धर्म। हर क्रियाकलाप में जुड़ जाए धर्म तो समाज में व्याप्त बुराइयाँ, विकृतियाँ व विकार हमारे जीवन में प्रवेश नहीं कर पाएंगे । रहा,
उन्होंने कहा कि प्यार बहुत ही छोटा सा शब्द है अगर सच्चा हो तो सारी दुनिया का मालिक भी इससे वश में हो जाए तो कोई बड़ी बात नहीं। प्रेम ही ईश्वर है, ईश्वर ही प्रेम है। बशर्ते वह प्रेम विशुद्ध हो, निष्काम हो, निस्वार्थ हो, निष्कपट हों ऐसा विशुद्ध निस्स्वार्थ, निष्कपट प्रेम परमात्मा का ही स्वरूप है जब यह स्वभाविक हमारे मन में उत्पन्न हो
तो लगता है कि सामने वाला कौन है कही ये साक्षात परमात्मा तो नहीं है। लेकिन स्थिर नहीं रहती है बुद्धि, प्रेम, आस्था विश्वास। ये परमात्मा नहीं है तो परमात्मा का कोई निकट जन है ये सदियों से लगता आया है क्योंकि अंत में स्वाभाविक प्रेम परमात्मा या परमात्मा के निज जन के प्रति ही उत्पन्न हो सकता है। परंतु आज दुर्भाग्यवश इसी प्रेम का अभाव सर्वत्र दिखाई देता है आज मूर्खतावश लोग वासनामय संबंधों को प्रेम कह देते हैं जो कि प्रेम का भी अपमान है।
उन्होंने अपने ओजस्वी प्रवचनों में कहा कि संत, गुरु, शास्त्र या ग्रंथ इनके पास क्या है यह इतना महत्वपूर्ण नहीं जितना यह कि श्रोता उनसे क्या ग्रहण करता है। बुद्धिमान वही कहलाता है जो व्यवहार करने से पूर्व विचार करता है। जबकि मूर्ख व्यक्ति व्यवहार के बाद विचार करता है उसे पश्चाताप, गिलानी व हास्य का पात्र बनना पड़ता है। अपने विवेक को कभी खोना नहीं चाहिए। स्वः सम्मान को कभी प्राप्ति का लक्ष्य नहीं बनाना चाहिए क्योंकि सम्मान को लक्ष्य बनाने पर यदि सम्मान नहीं मिला तो क्षुब्ध होना पड़ता है। विद्वान व्यक्ति अपनी संपूर्ण कामनाओं को संकुचित कर हर प्रकार के बंधनों से मुक्त हो जाता है। समस्त कामनाओं का परित्याग करके ही मनुष्य ब्रह्म भाव को प्राप्त करता है। सत्पुरुषों का आचरण व कार्य सदैव अनुकरणीय होता है।
आश्रम पर महाराज श्री के दर्शनार्थ व दिव्य प्रवचन सुनने के लिए दिनभर भक्तों का ताँता लगा हुआ है। दूर दूर से लोग बड़ी संख्या में पहुंच रहे हैं।

