अतुल्य भारत चेतना
मेहरबान अली कैरानवी
कैराना। उत्तर प्रदेश के शामली जिले के कैराना कस्बे में हरियाणा से आए सूदखोरों का अवैध साम्राज्य बिना किसी वैध लाइसेंस के धड़ल्ले से फल-फूल रहा है। गरीब और जरूरतमंद लोग बैंकों या सरकारी योजनाओं से कर्ज न मिलने पर इन सूदखोरों की चंगुल में फंस जाते हैं, जहां मनमर्जी की ब्याज दरों और कठोर वसूली के तरीकों से उनकी हालत बद से बदतर हो रही है। वसूली को लेकर कई बार हिंसक संघर्ष की नौबत आ जाती है, जिससे स्थानीय समुदाय में भय का माहौल है। सूदखोरों के इस काले धंधे ने गरीबों की लाचारी को अपनी पूंजी बना लिया है, और प्रशासन की उदासीनता से यह कारोबार बेरोकटोक जारी है।
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सूदखोरों का नेटवर्क: हरियाणा से आए, कैराना में सेंटर
कस्बे में इन दिनों हरियाणा निवासी सूदखोरों ने कई अवैध सेंटर खोल रखे हैं, जहां से वे गरीबों को नकदी देकर ऊंची ब्याज दरों पर कर्ज देते हैं। इन सेंटरों का संचालन दबंगई के बल पर किया जा रहा है, जबकि इनके पास कोई वैध लाइसेंस नहीं है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि सूदखोर घंटे के हिसाब से ब्याज वसूलते हैं। उदाहरण के लिए, सुबह कुछ हजार रुपये उधार देने के बाद शाम तक ब्याज सहित अधिक राशि वसूल ली जाती है। यदि कर्जदार तय समय पर पैसा नहीं लौटा पाता, तो उस पर दुर्बल वसूली प्रथाएं अपनाई जाती हैं, जैसे धमकी, अपशब्द और सामाजिक अपमान।
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सूत्रों के अनुसार, सूदखोरों का एक बड़ा नेटवर्क काम कर रहा है, जिसमें गुर्गे, वसूली दल और दबाव दल शामिल हैं। ये लोग समय आने पर अपनी असली भूमिका निभाते हैं, जैसे तोड़-फोड़, धमकी और कानूनी दबाव बनाकर संपत्ति हड़प लेना। कई मामलों में कर्ज देते समय ही कर्जदार से उसके गहने, जमीन या आभूषण गिरवी रखवा लिए जाते हैं, जो मूल राशि से कई गुना अधिक मूल्य के होते हैं। यदि ब्याज और मूलधन नहीं चुकाया जाता, तो सूदखोर इन संपत्तियों को अपने कब्जे में ले लेते हैं।
गरीबों की मजबूरी: बैंक से कर्ज न मिलने पर सूदखोरों की शरण
कैराना के गरीब और जरूरतमंद लोग अक्सर बैंकों या सरकारी योजनाओं से कर्ज नहीं ले पाते, क्योंकि दस्तावेजों की कमी या अन्य औपचारिकताओं के कारण। ऐसे में वे स्थानीय सूदखोरों की गिरफ्त में आ जाते हैं, जहां ब्याज दरें इतनी ऊंची होती हैं कि कर्ज चुकाना असंभव हो जाता है। कर्जदारों के अनुसार, वसूली के लिए अक्सर धमकी और हिंसा का सहारा लिया जाता है। कई बार संघर्ष की स्थिति बन जाती है, जहां सूदखोरों के गुर्गे कर्जदारों के घरों पर हमला कर देते हैं।
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एक स्थानीय निवासी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “ये सूदखोर हरियाणा से आकर यहां अपना साम्राज्य चला रहे हैं। गरीबों की मजबूरी का फायदा उठाते हैं। एक बार फंस गए तो निकलना मुश्किल है।” सूदखोरों की मनमानी से कई परिवार बर्बाद हो चुके हैं, और उनकी संपत्तियां हड़प ली गई हैं।
प्रशासन की उदासीनता: कोई कार्रवाई क्यों नहीं?
इस अवैध कारोबार के बावजूद स्थानीय प्रशासन और पुलिस की ओर से कोई ठोस कार्रवाई नहीं की जा रही है। सूदखोरों के सेंटर दिन-दहाड़े चल रहे हैं, लेकिन लाइसेंस की जांच या छापेमारी जैसी कोई पहल नहीं दिखती। स्थानीय लोगों का कहना है कि सूदखोरों की दबंगई और राजनीतिक पहुंच के कारण प्रशासन चुप है। कई बार शिकायतें की गईं, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।
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सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मांग की है कि प्रशासन तत्काल इन सेंटरों पर छापेमारी करे और सूदखोरों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई करे। उन्होंने कहा कि यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो यह समस्या और गंभीर हो सकती है, और गरीब परिवारों की स्थिति और खराब होगी।
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सामाजिक प्रभाव: गरीबी का चक्रव्यूह
यह सूदखोरी का काला धंधा न केवल आर्थिक शोषण है, बल्कि सामाजिक अपराध भी है। गरीबों की लाचारी सूदखोरों की पूंजी बन रही है, जिससे परिवार टूट रहे हैं और समाज में असंतोष बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी स्तर पर आसान कर्ज योजनाओं को बढ़ावा देकर और सूदखोरों पर नकेल कसकर इस समस्या को हल किया जा सकता है। कैराना जैसे कस्बों में ऐसे कारोबार की जड़ें गहरी हो चुकी हैं, और अब समय आ गया है कि प्रशासन जागे और न्याय सुनिश्चित करे।
