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माँ नर्मदा की भक्ति: बेटे की जान बचाने की मन्नत पूरी करने के लिए 1008 लोहे की कीलों पर दंडवत यात्रा

अतुल्य भारत चेतना (राजेन्द्र श्रीवास)

कन्नौद (देवास)। जीवनदायिनी माँ नर्मदा के प्रति भक्तों का अटूट विश्वास सदियों से चला आ रहा है। माँ नर्मदा अपने सच्चे भक्तों को कभी निराश नहीं करतीं, और उनकी कृपा से असंभव को संभव बनाने की अनगिनत कहानियाँ सामने आती रहती हैं। ऐसी ही एक चमत्कारिक घटना दो वर्ष पूर्व घटी, जब कन्नौद के सन्नौद निवासी एक मासूम बालक अंकुश जीवन और मौत की जंग लड़ रहा था। डॉक्टरों ने उसकी जान बचाने से इनकार कर दिया था, लेकिन माँ की भक्ति ने चमत्कार कर दिखाया। अब, मन्नत पूरी होने पर उसकी माँ गायत्री विनाक्या 1008 लोहे की कीलों पर लेटकर दंडवत यात्रा करते हुए माँ नर्मदा के पवित्र तट नेमावर की ओर बढ़ रही हैं। यह घटना भक्ति की शक्ति और मातृत्व की ताकत का जीवंत उदाहरण है।

घटना की पृष्ठभूमि

दो वर्ष पहले, सन्नौद गाँव के निवासी महेश विनाक्या और उनकी पत्नी गायत्री का जीवन एक भयानक संकट में घिर गया था। उनका छोटा बेटा अंकुश एक गंभीर बीमारी की चपेट में आ गया था, जिसके कारण वह जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा था। परिवार ने इंदौर और मुंबई के प्रमुख अस्पतालों, जैसे बॉम्बे हॉस्पिटल, में इलाज कराया, लेकिन डॉक्टरों ने स्पष्ट रूप से कह दिया कि बच्चे को बचाना अब असंभव है। चिकित्सकीय विज्ञान की सीमाओं के आगे झुकते हुए परिवार हताश हो चुका था। ऐसे में, माँ गायत्री ने माँ नर्मदा की शरण ली। उन्होंने नर्मदा मैया से हाथ जोड़कर प्रार्थना की और मन्नत मांगी कि यदि उनका बेटा स्वस्थ हो जाए, तो वे दंडवत यात्रा करते हुए नेमावर तट तक पहुंचेंगी।

गायत्री ने बताया कि उस समय उनकी झोली में सिर्फ आस्था थी। “मैंने माँ नर्मदा से कहा कि मेरे बच्चे को बचा लो, मैं तुम्हारे चरणों में दंडवत करते हुए आऊंगी,” उन्होंने भावुक होकर याद किया। माँ नर्मदा की कृपा से चमत्कार हुआ, और अंकुश धीरे-धीरे स्वस्थ होने लगा। डॉक्टरों को भी विश्वास नहीं हो रहा था कि जो बच्चा मौत के मुंह में था, वह अब पूरी तरह ठीक हो चुका है।

मन्नत पूरी करने का संकल्प

अब, दो वर्ष बाद, वह समय आ गया है जब गायत्री अपना संकल्प पूरा कर रही हैं। उन्होंने बताया कि यह यात्रा सामान्य नहीं है। वे 1008 लोहे की कीलों से बनी एक विशेष व्यवस्था पर लेटकर दंडवत कर रही हैं, जो भक्ति की कठिन तपस्या का प्रतीक है। यह संख्या 1008 हिंदू धर्म में पवित्र मानी जाती है, जो पूर्णता और समर्पण को दर्शाती है। गायत्री अपने बेटे अंकुश और पूरे परिवार के साथ इस यात्रा पर निकली हैं। यात्रा कन्नौद से शुरू होकर माँ नर्मदा के पवित्र तट नेमावर तक पहुंचेगी, जहाँ वे माँ की पूजा-अर्चना करेंगी।

“माँ नर्मदा ने मेरे बच्चे को नया जीवन दिया है। अब मैं अपना वादा निभा रही हूँ। यह दंडवत यात्रा मेरी कृतज्ञता का छोटा-सा माध्यम है,” गायत्री ने कहा। परिवार के सदस्यों ने बताया कि इस यात्रा के दौरान वे माँ नर्मदा के जयकारे लगाते हुए आगे बढ़ रहे हैं, और आसपास के ग्रामीण भी इस भक्ति दृश्य को देखकर भाव-विभोर हो रहे हैं।

भक्ति का व्यापक महत्व

यह घटना न केवल एक परिवार की कहानी है, बल्कि माँ नर्मदा के प्रति लाखों भक्तों की अटूट श्रद्धा का प्रमाण है। मध्य प्रदेश में नर्मदा नदी को जीवनदायिनी माना जाता है, और नेमावर तट एक प्रमुख तीर्थस्थल है जहाँ हर साल लाखों श्रद्धालु आते हैं। ऐसी घटनाएँ साबित करती हैं कि सच्ची भक्ति के आगे विज्ञान की सीमाएँ भी झुक जाती हैं। स्थानीय निवासियों का कहना है कि माँ नर्मदा के चमत्कारों की कहानियाँ नित नई हैं, जो लोगों को आस्था की राह पर चलने के लिए प्रेरित करती हैं।

इस घटना से प्रेरित होकर कई अन्य भक्त भी अपनी मन्नतें पूरी करने के लिए नेमावर की ओर रुख कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी परंपराएँ भारतीय संस्कृति की जड़ें मजबूत करती हैं, जहाँ मातृत्व, भक्ति और संकल्प की त्रिवेणी मिलती है।

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News Desk

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