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विश्व हिंदी दिवस विशेष हिंदी और आयुर्वेद : भारतीय ज्ञान परंपरा की वैश्विक पहचान

विश्व हिंदी दिवस विशेष,हिंदी और आयुर्वेद : भारतीय ज्ञान परंपरा की वैश्विक पहचान

सूरज कुमार तिवारी

संवाददाता बहराइच

दिनांक 11 जनवरी 2026 दिन रविवार बहराइच

बहराइच:- हर वर्ष 10 जनवरी को मनाया जाने वाला *विश्व हिंदी दिवस* केवल भाषा के सम्मान का अवसर नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति, जीवन-दर्शन और ज्ञान-विज्ञान को विश्व मंच पर प्रतिष्ठित करने का माध्यम भी है। *हिंदी वह सशक्त सेतु है, जिसने भारत की प्राचीन विद्या आयुर्वेद को जन-जन तक पहुँचाया है।*

आयुर्वेद भारत की अमूल्य धरोहर है, जिसकी जड़ें वेदों में निहित हैं। यह चिकित्सा पद्धति केवल रोगोपचार तक सीमित न होकर, *स्वस्थ जीवनशैली, संतुलित आहार, दिनचर्या, ऋतुचर्या तथा मानसिक स्वास्थ्य* का समग्र विज्ञान प्रस्तुत करती है। पंचमहाभूतों तथा वात-पित्त-कफ के संतुलन पर आधारित यह पद्धति आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी सहस्राब्दियों पूर्व थी।

इसी भारतीय ज्ञान परंपरा को हिंदी भाषा ने सरल, सुबोध और प्रभावी रूप में समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुँचाया है। आयुर्वेद के सिद्धांतों, उपचार पद्धतियों और जीवन मूल्यों को हिंदी ने न केवल संरक्षित किया, बल्कि आधुनिक संदर्भों में भी जनोपयोगी बनाया।

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*आयुर्वेद और हिंदी — हमारी सांस्कृतिक धरोहर*

हिंदी है जन-जन की मधुर पहचान,

इसी में सहेजा भारत का विज्ञान।

वेदों से निकला आयुर्वेद महान,

स्वस्थ जीवन का शाश्वत ज्ञान।

पंचतत्त्वों का संतुलित सूत्र,

निरोग काया का अटल स्रोत।

वन-औषधियों की अमृत धारा,

प्रकृति से जुड़ा जीवन सारा।

हिंदी बोले, आयुर्वेद सिखाए,

रोग नहीं, स्वास्थ्य अपनाए।

विश्व पटल पर भारत का संदेश—

स्वस्थ मानवता, यही है उद्देश्य।

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आज जब संपूर्ण विश्व *प्राकृतिक, सुरक्षित और समग्र चिकित्सा* की ओर अग्रसर है, तब आयुर्वेद की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। इस ज्ञान को वैश्विक मंच तक पहुँचाने में हिंदी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। हिंदी केवल संवाद की भाषा नहीं, बल्कि भारत की आत्मा और उसके विज्ञान की संवाहक है।

विश्व हिंदी दिवस के अवसर पर यह कहना उचित होगा कि *हिंदी और आयुर्वेद दोनों मिलकर भारत की सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक पहचान को सुदृढ़ करते हैं* और एक स्वस्थ, संतुलित तथा जागरूक समाज के निर्माण की दिशा में मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।

*डॉ. मनीष कुमार शर्मा*

*सह प्राध्यापक*,

डॉ. सर्वेश कुमार शुक्ल आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज एवं हॉस्पिटल,

*बहराइच, उत्तर प्रदेश*

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सूरज तिवारी

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