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Pathari news; समता और वीतराग: सुख और शांति की कुंजी, बाल ब्रह्मचारी पं. सुमतप्रकाश का उद्बोधन

अतुल्य भारत चेतना
ब्युरो चीफ हाकम सिंह रघुवंशी

पठारी/विदिशा। प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय, गुलाबगंज में आयोजित सात दिवसीय आध्यात्मिक शिविर के समापन पर बाल ब्रह्मचारी पं. सुमतप्रकाश ने ‘देव शास्त्र गुरु’ पर प्रेरक उद्बोधन दिया। उन्होंने आत्मज्ञान, समता, और वीतराग के महत्व पर प्रकाश डालते हुए उपस्थित लोगों को आत्मिक शुद्धता और मुक्ति के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। शिविर में बड़ी संख्या में लोगों ने भाग लिया और आध्यात्मिक ज्ञान अर्जित किया।

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देव शास्त्र गुरु: आत्मा का स्मरण

पं. सुमतप्रकाश ने कहा कि देव शास्त्र गुरु हमारे प्राण हैं और प्रत्येक कार्य में उनका स्मरण करना चाहिए। उन्होंने बताया, “देव शास्त्र गुरु से भावनात्मक दूरी ही वास्तविक दूरी है। हमें भगवान और गुरु के पास आकर आत्मा के स्वरूप को समझने का प्रयास करना चाहिए। जिन्हें हम आदर्श मानते हैं, उनके आचरण को अपनाकर ही हम सच्ची प्रसन्नता प्राप्त कर सकते हैं।” उन्होंने जीव रक्षा के लिए अहिंसा अणुव्रत का पालन करने की बात कही, जिसमें पानी छानना और दिन में भोजन करना शामिल है।

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आत्मा का स्वरूप और सुख-दुख का रहस्य

उन्होंने आत्मा को अदृश्य, अमूर्त, और सुखदायक बताते हुए प्रश्न उठाया, “यदि आत्मा सुखदायक है, तो दुख क्यों होता है?” इसके उत्तर में उन्होंने पांच प्रमुख भावों पर बल दिया, जो आत्मज्ञान और सम्यक दर्शन के लिए प्राथमिक हैं। इन भावों को समझे बिना आत्मा की सच्चाई को ग्रहण करना संभव नहीं। उन्होंने कहा, “समता और वीतराग का अभ्यास हमारे सुख और शांति की कुंजी है। चित्त को स्थिरता प्रदान करने से ही आत्मा की शुद्धता संभव है।”

सच्ची भक्ति और मिथ्या दृष्टि

पं. सुमतप्रकाश ने सच्ची भक्ति को आत्मा और ज्ञान की शुद्धता में तत्परता से जोड़ा। उन्होंने कहा कि बाह्य आचरण भक्ति का वास्तविक मापदंड नहीं है। मिथ्या दृष्टि से उत्पन्न होने वाली भावनाएं जैसे क्रोध, मोह, और दुख केवल अज्ञान का परिणाम हैं। उन्होंने परिणामिक भाव और अधिक भाव के बीच अंतर को समझने और यथार्थ चिंतन पर जोर दिया। उन्होंने कहा, “आत्मा को उसके स्वाभाविक सत्य के रूप में स्वीकार करना ही मुक्ति का मार्ग है। परंपरागत सोच और कर्मफल के डर से मुक्त होकर आत्मा की दिव्यता को पहचानना आवश्यक है।”

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संपत्ति से संपन्नता

उन्होंने संपत्ति से संपन्नता बढ़ाने का आह्वान करते हुए कहा कि इसका अर्थ है देव शास्त्र गुरु की भक्ति और समर्पण को बढ़ाना। जिनवाणी का स्वाध्याय और आत्मिक ज्ञान के अभ्यास से जीवन का उद्देश्य पूर्ण होता है। उन्होंने कहा, “आत्मिक ज्ञान और समता के अभाव में जीवन अधूरा रहता है। हमें अपने चित्त को संयम और प्रतिज्ञा के माध्यम से शुद्ध करना चाहिए।”

शिविर का समापन और आभार

शिविर के समापन पर प्रवक्ता डॉ. मक्खन लाल जैन ने बताया कि सभी उपस्थित लोगों ने इस आध्यात्मिक शिविर से गहरा धर्म लाभ प्राप्त किया। ट्रस्ट अध्यक्ष मलूकचंद जैन ने सभी का आभार व्यक्त किया। शिविर के सफल आयोजन में चर्चित भैया, अमित भैया, अक्षय सिंघई, डॉ. संजय अलंकार, और समस्त ट्रस्टीज के साथ-साथ जैन युवा व महिला फेडरेशन ने विशेष सहयोग प्रदान किया।

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सामाजिक और आध्यात्मिक प्रभाव

यह सात दिवसीय शिविर न केवल आध्यात्मिक जागृति का माध्यम बना, बल्कि समुदाय में समता, वीतराग, और आत्मिक शुद्धता के प्रति जागरूकता भी बढ़ाई। पं. सुमतप्रकाश के उद्बोधन ने उपस्थित लोगों को आत्मा के स्वरूप को समझने और जीवन में सुख-शांति की कुंजी खोजने के लिए प्रेरित किया। यह शिविर पठारी में आध्यात्मिकता और सामाजिक एकता को बढ़ावा देने का एक महत्वपूर्ण प्रयास रहा।

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News Desk

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