बड़ा रासमंडल में भक्तमाल कथा का भव्य शुभारंभ, कथा श्रवण कर भक्त हुए भाव विभोर
भक्तों की कथा स्वयं सुनते हैं भगवान- भक्तमाली महाराज
अतुल्य भारत चेतना (दिनेश सिंह तरकर)
मथुरा-वृंदावन। अखिल भारतीय श्रीपंच राधावल्लभीय निर्मोही अखाड़ा (बड़ा रासमंडल) में रसिक संत वैद्यभूषण श्रीमहंत माखनचोर दास महाराज के 135वें जन्म महा-महोत्सव के पावन अवसर पर सोमवार को ‘श्री भक्तमाल कथा’ का मंगलमय एवं भव्य शुभारंभ हुआ। कथा के प्रथम दिवस पर बड़ी संख्या में साधु-संत, महंत और भक्तजन उपस्थित हुए, जिससे पूरा मंदिर परिसर भक्तिमय वातावरण से सराबोर हो गया। भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ा और भजन-संकीर्तन की स्वर लहरियों ने वातावरण को और अधिक आध्यात्मिक बना दिया।

व्यासपीठ पर विराजमान महंत बिहारी दास भक्तमाली महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए इसकी अनुपम महिमा का वर्णन किया। उन्होंने भावपूर्ण उद्गार व्यक्त करते हुए कहा, “भक्तमाल कथा अत्यंत विलक्षण और दिव्य है। इसके वास्तविक श्रोता स्वयं ठाकुरजी (भगवान श्रीकृष्ण) होते हैं। वे बड़े चाव और आनंद के साथ अपने प्रिय भक्तों की पवित्र लीलाओं और चरित्रों का श्रवण करते हैं।” महाराज जी ने आगे बताया कि जहां भक्तों के चरित्रों का गुणगान होता है, वहां भगवान अदृश्य रूप में अवश्य उपस्थित रहते हैं और अपनी प्रसन्नता व्यक्त करते हैं।
हिताचार्य पीठ, श्रीजी मंदिर बाद ग्राम के महंत दंपति किशोर शरण महाराज ने बताया कि यह भव्य भक्तमाल कथा आयोजन बड़ा रासमंडल के श्रीमहंत लाड़िली शरण महाराज की पावन अध्यक्षता में संपन्न हो रहा है। प्रथम दिवस पर आध्यात्मिक वातावरण में सैकड़ों भक्तों ने भाग लिया। भजन-कीर्तन के साथ आरंभ हुई कथा ने पूरे परिसर को भक्ति रस में डुबो दिया।

गुरु महाराज के जन्म महा-महोत्सव के उपलक्ष्य में आगामी दिनों में विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान, भजन संध्या और अन्य आध्यात्मिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाएंगे। इस आयोजन से वृंदावन धाम में भक्ति की लहर और प्रबल हो गई है।

श्री भक्तमाल कथा की पूरी महिमा
श्री भक्तमाल मूलतः संत नाभादास जी महाराज द्वारा रचित एक अमर ग्रंथ है, जिसमें 200 से अधिक भक्तों के चरित्रों का संक्षिप्त किंतु दिव्य वर्णन किया गया है। यह ग्रंथ भक्ति साहित्य का अनमोल रत्न है, जो सभी संप्रदायों के भक्तों (जैसे कबीर, सूरदास, मीरा, तुलसीदास आदि) की महिमा का निष्पक्ष गुणगान करता है। भक्तमाल कथा इसी ग्रंथ पर आधारित होती है, जिसमें व्यासपीठ से भक्तों की लीलाओं का विस्तार से वर्णन किया जाता है।
भक्तमाल कथा की अनुपम महिमा
रसिक संतों एवं भक्तमाली परंपरा के अनुसार, भक्तमाल कथा की महिमा अत्यंत विलक्षण और अलौकिक है। मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
- भगवान स्वयं प्रधान श्रोता हैं: ठाकुरजी (श्री कृष्ण या राम) को भक्तों की कथा सुनने में अपार आनंद आता है। कहा जाता है कि जब भक्तमाल कथा होती है, तो भगवान अदृश्य रूप में उपस्थित होकर अपने प्रिय भक्तों की लीलाओं का बड़े चाव से श्रवण करते हैं। ठाकुरजी को तब तक नींद नहीं आती जब तक भक्तमाल कथा न सुन लें। भक्तों का गुणगान सुनकर वे अति प्रसन्न होते हैं।
- कलियुग में भगवद्प्राप्ति का सरल साधन: कलियुग में भक्ति प्राप्त करना कठिन है, किंतु भक्तमाल कथा सुनने से भक्ति रूपी जहाज मिल जाता है, जो भवसागर से पार उतार देता है। घर बैठे भाव से सुनने पर भी कथा स्थल पर आने जितना फल मिलता है। यह कथा मोक्ष प्रदान करने वाली मानी जाती है।
- भक्तों की महिमा भगवान से भी अधिक: गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है – “मोते संत अधिक करि लेखा” अर्थात भक्तों की महिमा भगवान से भी अधिक है। भक्तमाल में भक्तों के गुण गाने से भगवान पुत्र के समान प्रिय हो जाते हैं और गोद में बिठा लेते हैं।
- संतों का संग और भक्ति रस: भक्त चरित्र सुनना संतों का संग है। यह शुष्क हृदय को भक्ति रस से सराबोर कर देता है। सभी संप्रदायों के भक्तों का समान सम्मान होने से यह एकता और उदारता का प्रतीक है।
- नित्य धाम में भी श्रवण: परम सिद्ध संतों का मत है कि भगवान अपने नित्य धाम में भी श्री भक्तमाल का स्वाध्याय करते हैं। नित्य पार्षद जैसे अम्बरीष, ध्रुव आदि भी यह कथा नित्य सुनते हैं।
वृंदावन के बड़ा रासमंडल जैसे पवित्र स्थलों में भक्तमाली महाराजों द्वारा यह कथा आयोजित की जाती है, जहां भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ता है और पूरा वातावरण भक्ति रस में डूब जाता है।
यह कथा सुनकर भक्त का जीवन धन्य हो जाता है। जय श्री राधे!
संत नाभादास जी का जीवन वृत्तांत
संत नाभादास जी (जिन्हें नाभाजी या नाभा दास भी कहा जाता है) भक्ति काल के प्रमुख रसिक संत, कवि और भक्तमाल ग्रंथ के रचयिता हैं। वे रामानंद संप्रदाय की रामभक्ति शाखा से संबंधित थे और भक्ति आंदोलन में उनका महत्वपूर्ण योगदान है। उनकी रचना श्री भक्तमाल भक्ति साहित्य का एक अनमोल रत्न है, जिसमें चारों युगों के 200 से अधिक भक्तों के चरित्रों का संक्षिप्त किंतु दिव्य वर्णन किया गया है। यह ग्रंथ सभी संप्रदायों के भक्तों का निष्पक्ष गुणगान करता है।
जन्म एवं प्रारंभिक जीवन
नाभादास जी की जन्म-मृत्यु तिथियाँ एवं जन्मस्थान के बारे में विद्वानों में मतभेद है तथा प्रमाणों के अभाव में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता।
- अधिकांश स्रोतों के अनुसार वे 16वीं-17वीं शताब्दी (लगभग 1570-1640 ईस्वी के आसपास) के थे।
- कुछ परंपराओं में जन्म संवत् 1585 (1537 ईस्वी) के आसपास माना जाता है।
- जन्मस्थान के बारे में भी विभिन्न मत हैं – कुछ गलता (जयपुर, राजस्थान), कुछ भद्राचल (तेलंगाना), कुछ अयोध्या के निकट खैरा गांव बताते हैं।
- एक प्रसिद्ध किंवदंती है कि वे जन्मांध थे। बाल्यावस्था में पिता की मृत्यु हो गई और अकाल के कारण माता उन्हें वन में छोड़ गईं। वहाँ संत कील्हदेव जी एवं अग्रदास जी ने उन्हें पाया, उठाया और दीक्षा दी। बाद में गुरु कृपा से उनकी आँखें खुलीं और वे संत-सेवा में जीवन समर्पित कर दिए।
गुरु एवं संप्रदाय
- गुरु: श्री अग्रदास जी महाराज (कृष्णदास पयहारी के शिष्य, जो रामानंद जी की परंपरा में थे)।
- वे रामानंद संप्रदाय के रामभक्त थे। गलता घाटी (राजस्थान) में उनकी साधना का मुख्य केंद्र रहा।
- वे तुलसीदास जी के समकालीन माने जाते हैं और कुछ कथाओं में दोनों की भेंट का उल्लेख है।
प्रमुख रचना एवं योगदान
- श्री भक्तमाल (रचना काल लगभग 1585-1600 ईस्वी): ब्रजभाषा में लिखित यह ग्रंथ भक्तों की माला है। इसमें सत्ययुग से कलियुग तक के भक्तों (जैसे कबीर, सूरदास, मीरा, तुलसीदास आदि) का वर्णन है। यह ग्रंथ चमत्कारों पर नहीं, भक्ति की शुद्धता पर केंद्रित है।
- अन्य रचनाएँ: अष्टयाम, रामभक्ति संबंधी पद आदि।
- बाद में प्रियादास जी (1712 ईस्वी) ने इसकी प्रसिद्ध टीका भक्तिरस बोधिनी लिखी, जिससे यह और लोकप्रिय हुआ।
नाभादास जी का जीवन संत-सेवा, विनम्रता और भक्ति का प्रतीक है। उन्होंने भक्ति को संप्रदायों की सीमाओं से ऊपर उठाकर सभी भक्तों को एक माला में पिरोया। उनकी रचना आज भी भक्तमाल कथाओं के माध्यम से लाखों भक्तों को प्रेरित करती है।

