अतुल्य भारत चेतना | स्पेशल रिपोर्ट
मुंबई। बॉलीवुड की दुनिया में देशभक्ति की फिल्में हमेशा से दर्शकों के दिलों में एक खास जगह रखती आई हैं। ‘बॉर्डर’ से लेकर ‘उरी’ और ‘केसरी’ तक, ये फिल्में न सिर्फ मनोरंजन करती हैं, बल्कि इतिहास के उन पन्नों को जीवंत कर देती हैं जो कभी भुलाए नहीं जा सकते। इसी कड़ी में रिलीज हुई फरहान अख्तर की नवीनतम फिल्म 120 बहादुर एक ऐसा ही मील का पत्थर साबित हो रही है। 21 नवंबर 2025 को सिनेमाघरों में रिलीज हुई यह वॉर ड्रामा फिल्म 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान लद्दाख के रेजांग ला दर्रे पर लड़े गए ऐतिहासिक युद्ध पर आधारित है। जहां 120 भारतीय सैनिकों ने 3000 से अधिक चीनी सैनिकों का डटकर मुकाबला किया और चुषुल घाटी को बचाने के लिए अपनी जान की बाजी लगा दी। यह फिल्म न सिर्फ एक सैन्य संघर्ष की कहानी है, बल्कि बलिदान, साहस और अटूट देशभक्ति की भावुक श्रद्धांजलि भी है। रिलीज के दसवें दिन तक बॉक्स ऑफिस पर 15 करोड़ से अधिक की कमाई कर चुकी यह फिल्म दर्शकों और क्रिटिक्स दोनों से सराहना बटोर रही है।
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फिल्म का सार: एक वास्तविक नायक की अनकही कहानी
फिल्म का केंद्र है मेजर शैतान सिंह भाटी (फरहान अख्तर), जो 13 कुमाऊं रेजिमेंट के कमांडिंग ऑफिसर थे। 18 नवंबर 1962 को, माइनस 30 डिग्री की ठंड, ऊंचाई और सीमित संसाधनों के बीच, इन 120 ‘बहादुरों’ ने चीनी सेना के हमले का सामना किया। निर्देशक रजनीश ‘रजी’ घई ने इस घटना को इतने संवेदनशील और यथार्थवादी ढंग से बुना है कि दर्शक खुद को उस युद्धक्षेत्र में महसूस करने लगते हैं। स्क्रीनप्ले राजीव जी. मेनन द्वारा लिखा गया है, जिसमें सुमित अरोड़ा के संवादों ने भावनाओं को और गहराई दी है। अमिताभ बच्चन की नैरेशन फिल्म को एक महाकाव्यात्मक आयाम देती है, जो शुरू से ही दर्शकों को इतिहास के पन्नों में खींच ले जाती है।
फिल्म की शुरुआत अहीर समुदाय के सैनिकों की पृष्ठभूमि से होती है – एक ऐसा समुदाय जो मुख्य रूप से खेती से जुड़ा था, लेकिन लद्दाख की कठोर परिस्थितियों में ढल गया। यहाँ परिवारों की चिंताओं, सैनिकों की मजबूती और युद्ध की क्रूरता का संतुलन बखूबी दिखाया गया है। पहला हाफ थोड़ा धीमा लग सकता है, जहां चरित्रों का परिचय और युद्ध की तैयारी पर फोकस है, लेकिन दूसरा हाफ एक तूफान की तरह आता है। हैंड-टू-हैंड कॉम्बैट, गोलाबारी और सैनिकों के एक-एक नाम के साथ अंतिम सांस तक लड़ने के दृश्य रोंगटे खड़े कर देते हैं। यह फिल्म युद्ध की भयावहता को दिखाती है, लेकिन साथ ही यह भी बताती है कि सच्ची वीरता चुपचाप आती है – बिना किसी अतिरिक्त ड्रामे के।
अभिनय का जलवा: फरहान अख्तर की वापसी ने जीता दिल
फरहान अख्तर चार साल के लंबे ब्रेक के बाद (‘तूफान’ के बाद) बड़े पर्दे पर लौटे हैं और उन्होंने साबित कर दिया कि वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। मेजर शैतान सिंह के किरदार में फरहान ने न सिर्फ शारीरिक परिवर्तन (फिटनेस और ट्रेनिंग) किया, बल्कि भावनात्मक गहराई भी उतारी है। उनके चेहरे पर वो दृढ़ संकल्प और अंतिम क्षणों में वो दर्द दिखता है जो दर्शकों को आंसू के पूल में डुबो देता है। एक दृश्य में जब वे घायल होकर भी लड़ते हैं, तो लगता है जैसे वे खुद उस युद्ध में हैं। क्रिटिक्स ने इसे फरहान की सबसे मार्मिक परफॉर्मेंस बताया है।
राशी खन्ना मेजर की पत्नी के रोल में संयमित लेकिन प्रभावशाली हैं। वे परिवार की चिंता और गर्व को बखूबी व्यक्त करती हैं, हालांकि उनका किरदार थोड़ा कम विकसित लगता है। सपोर्टिंग कास्ट में विवान भटेना (सूरज राम के रूप में), अंकित सिवाच, धनवीर सिंह और साहिब वर्मा जैसे युवा कलाकारों ने जान फूंक दी है। विवान की ग्रिट और ग्रेस ने खास तारीफ बटोरी है। एजाज खान और अजिंक्य देवो जैसे वेटरन्स ने युद्ध दृश्यों को और विश्वसनीय बनाया। कुल मिलाकर, यह एक एन्सेम्बल परफॉर्मेंस है जो सामूहिक बलिदान की भावना को जीवंत करती है।
तकनीकी उत्कृष्टता: विजुअल्स जो लद्दाख की ठंड महसूस करा दें
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसके विजुअल्स हैं। सिनेमैटोग्राफर तेत्सुओ नागाटा ने लद्दाख के बर्फीले दर्रों, ऊंची चोटियों और युद्ध के धुंधले धमाकों को इतने खूबसूरती से कैप्चर किया है कि दर्शक खुद सिहर उठते हैं। वास्तविक लोकेशन्स पर शूटिंग ने फिल्म को एक प्रामाणिक लुक दिया है। एक्शन कोरियोग्राफी रियलिस्टिक है – कोई फैंसी CGI नहीं, बल्कि कच्चा, खूनी संघर्ष। बैकग्राउंड स्कोर ने इमोशंस को और ऊंचा किया, हालांकि कुछ गाने थोड़े कमजोर लगे। प्रोडक्शन डिजाइन (एक्सेल एंटरटेनमेंट और ट्रिगर हैप्पी स्टूडियोज) ने 1960 के दशक की वर्दी, हथियार और माहौल को बखूबी रीक्रिएट किया।
क्रिटिक्स और दर्शकों की प्रतिक्रियाएं: मिश्रित लेकिन सकारात्मक
रिलीज के बाद क्रिटिक्स ने फिल्म को औसतन 3 से 3.5 स्टार दिए हैं। इंडियन एक्सप्रेस ने इसे “एक्शन और इमोशन से भरी” बताया, जबकि टाइम्स ऑफ इंडिया ने कहा कि यह “बहादुरों को सलाम करती है, लेकिन चरित्रों से गहरा कनेक्शन कम है।” रेडिफ ने इसे “स्टैंडर्ड वॉर ड्रामा” कहा, लेकिन इमोशनल कोर की तारीफ की। IMDb पर 7.5 रेटिंग के साथ दर्शक इसे “मस्ट वॉच” बता रहे हैं। सोशल मीडिया पर यूजर्स ने फरहान की परफॉर्मेंस और एंड क्रेडिट्स में सैनिकों के नाम रोल होने को “हृदयस्पर्शी” कहा। सेलिब्रिटीज जैसे ऋतिक रोशन ने इसे “खूबसूरत और दमदार” बताया, वीरेंद्र सहवाग ने कहा “दिल भर आया”, और रणदीप हुड्डा ने “बहुत खूबसूरती से कही गई कहानी” कहा। कुछ ने पहला हाफ धीमा बताया, लेकिन कुल मिलाकर, यह फिल्म युवा पीढ़ी के लिए एक सबक है – संघर्ष और विलासिता की परिभाषा बदलने वाली।
बॉक्स ऑफिस पर धीमी लेकिन स्थिर शुरुआत
फिल्म ने पहले दिन कमजोर ओपनिंग की (लगभग 2-3 करोड़), लेकिन वीकेंड पर ग्रोथ हुई। आठवें दिन तक 15.4 करोड़ नेट कलेक्शन हो चुका है। ‘मस्ती 4’ से क्लैश के बावजूद, दिल्ली में टैक्स-फ्री होने से बूस्ट मिला। वर्ल्डवाइड 20 करोड़ के आसपास पहुंच चुकी फिल्म लंबे रन की उम्मीद जगाती है, खासकर आर्मी फैमिली और स्कूलों में स्पेशल स्क्रीनिंग्स से।
निष्कर्ष: एक जरूरी श्रद्धांजलि, जो प्रेरणा देती है
120 बहादुर कोई परफेक्ट फिल्म नहीं है – इसमें स्क्रीनप्ले की कुछ कमियां हैं, इमोशनल डेप्थ थोड़ी कम, और पहला हाफ स्लो। लेकिन यह एक नेक इरादे वाली फिल्म है, जो रेजांग ला के उन 120 बहादुरों को सलाम करती है जिन्होंने कहा था, “कर चले हम फिदा जान-ओ-तन साथियों…”। यह फिल्म हमें याद दिलाती है कि देशभक्ति सिर्फ नारे नहीं, बल्कि चुपचाप दिए गए बलिदान हैं। अगर आप इतिहास, इमोशन और सच्ची वीरता का कॉकटेल चाहते हैं, तो थिएटर में जरूर जाएं। रेटिंग: ⭐⭐⭐½ (3.5/5)। जय हिंद!
(रिपोर्ट: ग्रोक स्पेशल डेस्क | स्रोत: विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स और सोशल मीडिया रिव्यूज)

