ऐतिहासिक रतनपुर में उपेक्षा और अव्यवस्था से बिगड़ी तालाबों की स्थिति
अतुल्य भारत चेतना
प्रमोद कश्यप
रतनपुर। ऐतिहासिक एवं पौराणिक नगरी रतनपुर, जिसे मंदिरों और तालाबों की नगरी के रूप में जाना जाता है, आज उपेक्षा का शिकार होती जा रही है। लगभग 800 वर्षों तक दक्षिण कौशल की राजधानी रहे इस नगर में कभी करीब 200 तालाब हुआ करते थे। इन्हीं तालाबों से कृषि कार्य, सिंचाई और आमजन की निस्तारी आवश्यकताएँ पूरी होती थीं। लेकिन आज इन तालाबों की स्थिति चिंताजनक हो चुकी है।
कभी निर्मल जल से भरे रहते थे तालाब
पुराने समय में मोहल्लों के निस्तारी तालाबों का पानी इतना स्वच्छ और निर्मल होता था कि लोग न केवल स्नान और कपड़े धोते थे बल्कि पीने के लिए भी इन्हीं तालाबों का उपयोग करते थे। इन्हीं कारणों से इन्हें पनपीया तालाब भी कहा जाता था।
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प्रसिद्ध कवियों ने इन तालाबों की सुंदरता और महत्व का बखान किया है। बैरागबन तालाब के बारे में एक कवि ने लिखा था—
“नर-नारी मज्जन करे, उठे छत्तीसों राग।
ऐसे रसिक तालाब को, लोग कहें बैराग।”

आज अतिक्रमण और गंदगी से पटे तालाब
समय के साथ अतिक्रमण, गंदगी और लापरवाही ने तालाबों की सुंदरता और उपयोगिता छीन ली है। अधिकांश निस्तारी तालाब अब नालियों के गंदे पानी और मछली पालन के चलते प्रदूषित हो चुके हैं।
- करैहापारा का बेद तालाब इसका प्रमुख उदाहरण है, जहाँ कभी मोहल्ले की नालियों का पानी बड़े पुल वाले नाले में बहा दिया जाता था। लेकिन किसानों की स्वार्थपरता के चलते नाले का अस्तित्व ही खत्म हो गया, जिसके कारण अब पूरा गंदा पानी सीधे तालाब में ही जा रहा है।
- इसी प्रकार कई मोहल्लों में गंदगी निकासी के पुराने रास्ते बंद हो चुके हैं, जिससे तालाब दूषित हो रहे हैं।
स्थानीय लोगों की चिंता और मांग
स्थानीय निवासियों का कहना है कि यदि पुराने नालों और निकासी मार्गों को पुनर्जीवित किया जाए, तो निस्तारी तालाबों में गंदा पानी जाने की समस्या काफी हद तक दूर हो सकती है।
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वर्तमान में नगर के 60–65 तालाब मछली पालन ठेका से मुक्त हैं, लेकिन आने वाले दिनों में नगर पालिका इन्हें भी ठेके पर देने की तैयारी कर रही है। इसमें कई पुराने निस्तारी तालाब भी शामिल हैं।
लोगों की मांग है कि—
- निस्तारी तालाबों को मछली पालन हेतु ठेका से मुक्त रखा जाए, ताकि स्थानीय लोग इनका उपयोग स्नान, कपड़े धोने और अन्य निस्तारी कार्यों में कर सकें।
- साथ ही प्रशासन को चाहिए कि नालियों की निकासी व्यवस्था दुरुस्त करे और तालाबों की नियमित सफाई एवं संरक्षण की योजना बनाई जाए।
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उपेक्षा पर उठ रहे सवाल
इतिहास के साक्षी रहे ये तालाब न केवल नगर की पहचान हैं बल्कि यहाँ की सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं से भी गहराई से जुड़े हुए हैं। ऐसे में नगरवासियों का सवाल है कि आखिर क्यों प्रशासन इन ऐतिहासिक धरोहरों की अनदेखी कर रहा है? लोगों का मानना है कि यदि समय रहते इन तालाबों की सफाई और संरक्षण नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियाँ केवल इनके नाम और इतिहास को ही जान पाएंगी।

