अतुल्य भारत चेतना
प्रमोद कश्यप
रतनपुर/बिलासपुर। ऐतिहासिक नगरी रतनपुर, जिसे मंदिरों और तालाबों की नगरी के रूप में जाना जाता है, आज नगरपालिका की लापरवाही के कारण जल संकट और आर्थिक नुकसान का शिकार हो रही है। यहां 150 से अधिक तालाब हैं, जो न केवल स्थानीय जल स्रोत हैं बल्कि मछली पालन के माध्यम से नगरपालिका के प्रमुख राजस्व स्रोत भी हैं। लेकिन विगत कुछ माह से लगभग 60-65 तालाब ठेका प्रक्रिया के अभाव में “स्वतंत्र” हो चुके हैं, और इनका अवैध दोहन स्थानीय लोगों द्वारा व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए किया जा रहा है। करैहापारा मोहल्ले के प्रमुख तालाब—रत्नेश्वर, बेद और केरा—भी इसकी शिकार हैं। नगरपालिका की उदासीनता से न केवल मछलियां खाली हो रही हैं, बल्कि तालाबों का रखरखाव भी प्रभावित हो रहा है, जो भविष्य में जल संकट को जन्म दे सकता है। स्थानीय निवासियों ने प्रशासन से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है, ताकि सार्वजनिक हितों की रक्षा हो सके।

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रतनपुर के तालाब: ऐतिहासिक धरोहर और आर्थिक महत्व
रतनपुर, छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में स्थित यह प्राचीन नगरी रामायण काल से जुड़ी हुई है, जहां 52 मंदिरों के साथ-साथ सैकड़ों तालाब इसकी शोभा बढ़ाते हैं। इन तालाबों को नगरपालिका द्वारा मछली पालन के लिए ठेके पर दिया जाता है, जो न केवल राजस्व उत्पन्न करता है बल्कि स्थानीय मछुआरों को रोजगार भी प्रदान करता है। छत्तीसगढ़ मत्स्य पालन नीति 2003 और उसके संशोधनों के अनुसार, 10 वर्ष के लिए लीज पर दिए जाने वाले इन तालाबों से नगरपालिका को लाखों रुपये की आय होती है। 2016 में ही 62 तालाबों को लीज पर देने की प्रक्रिया शुरू की गई थी, लेकिन आवंटन में आरोप-प्रत्यारोप के कारण यह प्रक्रिया अटकी हुई है।
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हालांकि, ठेका प्रक्रिया में देरी के कारण कई तालाब अनियंत्रित हो गए हैं। पूर्व ठेकेदारों द्वारा डाली गई मछलियां अब अवैध रूप से पकड़ी जा रही हैं, और नगरपालिका की ओर से कोई कार्रवाई नहीं हो रही। स्थानीय निवासी रमेश साहू ने बताया, “ये तालाब हमारी धरोहर हैं। मछली पालन से न केवल पालिका को राजस्व मिलता है, बल्कि हम जैसे ग्रामीणों को सस्ती मछली भी उपलब्ध होती है। लेकिन अब ये व्यक्तिगत स्वार्थ का शिकार बन रहे हैं।”
अवैध दोहन की हकीकत: मोहल्लेवासियों का कब्जा, नगरपालिका मौन
करैहापारा मोहल्ले के रत्नेश्वर, बेद और केरा तालाबों में पूर्व ठेकेदारों द्वारा डाली गई हजारों मछलियां अब लगभग समाप्त हो चुकी हैं। मोहल्ले के कुछ निवासी जाल, गिननेट और अन्य अवैध साधनों से रातोंरात मछली पकड़ रहे हैं, जो छत्तीसगढ़ मत्स्य पालन नियमों का स्पष्ट उल्लंघन है। बेद तालाब में तो नालियों का गंदा पानी गिरने के बावजूद लोग नहाने-धोने का काम कर रहे हैं, जो स्वास्थ्य के लिए खतरा है। सबसे चिंताजनक यह है कि तालाबों को फोड़ दिया गया है, जिससे पानी का बड़ा हिस्सा बह गया है। इससे तालाब सूखने का खतरा बढ़ गया है, और निस्तार (पानी का उपयोग) करने वाले निवासियों को आने वाले दिनों में कठिनाई हो सकती है।

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निवासी मीना बाई ने शिकायत की, “हमारे मोहल्ले के ही लोग तालाबों का दोहन कर रहे हैं। नगरपालिका को अगर ठेका आवंटन में समस्या है, तो कम से कम मछलियों को निकालकर बेचकर राजस्व कमाएं। लेकिन कुछ नहीं हो रहा। अब तालाब खाली हो चुके हैं, और रखरखाव कौन करेगा?” यह अवैध दोहन न केवल आर्थिक नुकसान पहुंचा रहा है, बल्कि पर्यावरणीय असंतुलन भी पैदा कर रहा है, क्योंकि तालाबों का जल स्तर गिरने से भूजल रिचार्ज प्रभावित हो रहा है।
नगरपालिका की उदासीनता: ठेका प्रक्रिया अटकी, राजस्व का नुकसान
नगरपालिका अध्यक्ष लवकुश कश्यप के नेतृत्व में ठेका प्रक्रिया को पूरा करने में देरी हो रही है। मत्स्य निरीक्षक पर आरोप लगे हैं कि वे चहेतों को फायदा पहुंचाने के लिए प्रक्रिया को गुमराह कर रहे हैं। मोहल्ले से पार्षद हकीम मोहम्मद और सूरज कश्यप भी इस मुद्दे पर मौन हैं, जबकि वे ही तालाबों की निगरानी के जिम्मेदार हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि व्यक्तिगत हितों के कारण कोई कार्रवाई नहीं हो रही। एक निवासी ने कहा, “पार्षद जी खुद मोहल्ले के हैं, लेकिन वे चुप हैं। क्या वे भी इस दोहन में शामिल हैं?”
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नगरपालिका से संपर्क करने पर कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला। हालांकि, छत्तीसगढ़ सरकार की मत्स्य पालन नीति के तहत पंचायतों और नगरपालिकाओं को तालाबों को लीज पर देने का अधिकार है, लेकिन रखरखाव और अवैध दोहन रोकने की जिम्मेदारी भी उसी की है। विगत वर्षों में जिले के अन्य क्षेत्रों में भी तालाबों के अवैध पट्टे और रखरखाव की कमी के मामले सामने आए हैं, जो राज्यव्यापी समस्या को दर्शाते हैं।

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स्थानीय मांगें: ठोस कार्रवाई और रखरखाव की अपील
मोहल्लेवासियों ने नगरपालिका से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। उन्होंने कहा कि तालाबों से होने वाली आय को बरकरार रखने के लिए ठेका प्रक्रिया तेज की जाए, अवैध दोहन पर रोक लगाई जाए, और मरम्मत कार्य शुरू किया जाए। एक सामूहिक ज्ञापन सौंपने की योजना भी बनाई जा रही है। निवासी रामू यादव ने कहा, “ये तालाब हमारी आजीविका का स्रोत हैं। नगरपालिका को चाहिए कि मछली पालन को प्रोत्साहित करे, न कि अनदेखा करे। मनरेगा जैसी योजनाओं से तालाबों का रखरखाव भी संभव है।”

