शहडोल जिले का शायद ही कोई कोना बचा हो—चाहे शहर की शुरुआत हो या गांवों का अंतिम छोर—जहां किसान आज खुद को ठगा हुआ महसूस न कर रहा हो। हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि किसान की बदहाली की जिम्मेदारी लेने वाला कोई नहीं बचा। सरकार ने धान की सरकारी खरीदी शुरू होने का दावा जरूर किया है, लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट तस्वीर पेश कर रही है।
अव्यवस्थित, सुस्त और लचर खरीदी व्यवस्था ने किसानों को ऐसी खोखली चौखट पर खड़ा कर दिया है, जहां से बाहर निकलने का एक ही रास्ता दिखाई देता है—बिचौलियों के दरवाजे तक। सरकारी केंद्रों पर अव्यवस्था, लंबी कतारें, तकनीकी खामियां और भुगतान की अनिश्चितता ने किसान को मानसिक और आर्थिक दोनों रूप से तोड़ दिया है।
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इसी मजबूरी का फायदा उठाकर बिचौलियों का साम्राज्य जिले में बेखौफ तरीके से फल-फूल रहा है। गांव-गांव घूमकर पहले किसानों को भरोसे में लिया जा रहा है और फिर ₹1200 से ₹1500 प्रति क्विंटल की दर पर धान खरीदा जा रहा है, जबकि सरकार द्वारा घोषित समर्थन मूल्य कहीं अधिक है। किसान चाहकर भी सरकारी दर पर बेचने की स्थिति में नहीं रह गया है।
छोटा किसान हो या मध्यम, हर वर्ग का किसान आज यह कहने को मजबूर है कि खेती अब घाटे का सौदा बन चुकी है। खेत में पसीना बहाकर उगाई गई फसल को औने-पौने दामों में बेचते हुए किसान अपनी ही मेहनत पर पानी फेर रहा है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह पूरा खेल शासन-प्रशासन की जानकारी में होने के बावजूद अब तक बिचौलियों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई है। न छापेमारी, न पंजीयन रद्द, न एफआईआर—मानो व्यवस्था इन बिचौलियों के आगे बेबस नजर आ रही हो।
यह स्थिति कई गंभीर सवाल खड़े करती है—
- क्या सरकारी धान खरीदी सिर्फ कागजी औपचारिकता बनकर रह गई है?
- क्या किसानों को उनका हक दिलाने की जिम्मेदारी कोई लेगा?
- या फिर बिचौलियों का यह खुला खेल इसी तरह चलता रहेगा?
जब तक धान खरीदी व्यवस्था को पूरी तरह दुरुस्त नहीं किया जाता और बिचौलियों पर सख्त और दिखने वाली कार्रवाई नहीं होती, तब तक जिले का किसान लुटता रहेगा और सरकार जवाबदेही से बचती रहेगी।

