शहडोल
ड्यूटी के दौरान अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हुए शहादत पाने वाले आरक्षक महेश पाठक की मौत को लेकर जिले में गहरा आक्रोश है। सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि शहादत के 2 दिन बाद भी शहडोल के प्रभारी मंत्री और क्षेत्रीय सांसद ने सार्वजनिक रूप से शोक संवेदना तक व्यक्त नहीं की।
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यह चुप्पी अब केवल प्रशासनिक उदासीनता नहीं, बल्कि शहीद के सम्मान के साथ भेदभाव के रूप में देखी जा रही है।
वहीं दूसरी ओर एक पुराना उदाहरण लोगों के ज़ेहन में है।
ब्यौहारी (शहडोल) में ड्यूटी के दौरान शहीद हुए महेंद्र बागरी, जो मूल रूप से सतना जिले के गृह ग्राम से थे—उनके मामले में सतना सांसद गणेश सिंह ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर न केवल शहीद का दर्ज़ा दिलवाया, बल्कि एक करोड़ रुपये की सहायता भी स्वीकृत करवाई थी।
उस समय मुख्यमंत्री स्वयं श्रद्धांजलि देने पहुँचे थे और मंत्री भी मौजूद थीं।
अब सवाल उठ रहे हैं—
क्या शहडोल के शहीदों की क़ुर्बानी कम मूल्य की है?
क्या अपने ही जिले के जनप्रतिनिधियों को अपने जवानों की परवाह नहीं?
क्या शहादत के सम्मान के लिए किसी और जिले के सांसद की सिफ़ारिश ज़रूरी है?
आरक्षक महेश पाठक की शहादत ने पूरे जिले को झकझोर दिया है। आमजन, सामाजिक संगठनों और पुलिस महकमे में यह भावना तेज़ी से उभर रही है कि शहीद का सम्मान राजनीति या क्षेत्र के आधार पर तय नहीं होना चाहिए।
अब सवाल सिर्फ संवेदना का नहीं, सम्मान और न्याय का है।

