अतुल्य भारत चेतना (आशुतोष सूर्यवंशी)
परासिया (छिंदवाड़ा)। राष्ट्रीय अंधत्व निवारण मिशन (National Programme for Control of Blindness) के तहत गरीब मरीजों को मुफ्त मोतियाबिंद ऑपरेशन प्रदान करने की सरकारी योजना के नाम पर छिंदवाड़ा जिले के परासिया स्थित लायंस आई हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर में हुए कथित करोड़ों के घोटाले को उजागर हुए पूरे एक साल बीत चुके हैं। इस संवेदनशील मामले में फर्जी बिल और दस्तावेजों के आधार पर सरकारी धन हड़पने का आरोप है, लेकिन मुख्य दोषियों की गिरफ्तारी और गबन की राशि की पूर्ण वसूली अब तक नहीं हो पाई है।
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घोटाले का पर्दाफाश और एफआईआर का इतिहास
यह मामला जनवरी 2025 में सुर्खियों में आया, जब स्थानीय समाजसेवी और सक्रिय आरटीआई कार्यकर्ता रिंकू रितेश चौरसिया ने आरटीआई के माध्यम से प्राप्त जानकारी के आधार पर स्वास्थ्य विभाग और लोकायुक्त को शिकायत दर्ज कराई। जांच में पाया गया कि अस्पताल प्रबंधन ने कोविड की पहली और दूसरी लहर के दौरान हजारों फर्जी मोतियाबिंद ऑपरेशन दिखाकर सरकारी फंड हासिल किया।
- मुख्य रूप से फर्जी मोबाइल नंबर (करीब 1380 गलत नंबर) और फर्जी बिलों के आधार पर धोखाधड़ी का खुलासा हुआ।
- रिपोर्ट्स के अनुसार, अस्पताल ने लगभग 7,252 फर्जी ऑपरेशन दिखाकर 1 करोड़ रुपये से अधिक की राशि प्राप्त की, जबकि वास्तविक ऑपरेशन बहुत कम थे।
- जांच में 75 प्रतिशत से अधिक बिल फर्जी पाए गए, जिसके बाद नेशनल हेल्थ मिशन (NHM) ने अस्पताल के साथ एमओयू रद्द कर दिया।
परिणामस्वरूप, 10 जनवरी 2025 को परासिया थाने में एफआईआर दर्ज की गई। इसमें पिंकेश पटोरिया, पुरन राजलानी, आलोक जैन, अनिल जैन, बिल्लू मान, हरिशंकर साहू, कन्हैया राजलानी समेत अन्य आरोपियों के खिलाफ धारा 420, 409, 34 (धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात) के तहत मुकदमा दर्ज हुआ। यह शिकायत मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO), छिंदवाड़ा की ओर से लोकायुक्त के निर्देश पर दर्ज कराई गई थी।
गरीब मरीजों के हक पर डाका
राष्ट्रीय अंधत्व निवारण मिशन के तहत गरीब और जरूरतमंद मरीजों को मुफ्त मोतियाबिंद सर्जरी उपलब्ध कराने की योजना का यह दुरुपयोग बेहद गंभीर माना जा रहा है। रिंकू रितेश चौरसिया ने प्रेस को संबोधित करते हुए कहा,
“यह महज वित्तीय भ्रष्टाचार नहीं है, बल्कि उन गरीब मरीजों के साथ विश्वासघात है, जिन्हें आंखों की रोशनी मिलने की उम्मीद थी। अस्पताल ने कागजी ऑपरेशन दिखाकर सरकार से मोटी रकम हड़पी, जबकि असल में गरीबों को कोई लाभ नहीं मिला। यह ‘अंधत्व निवारण’ के नाम पर ‘अंधा खेल’ है।”
प्रशासनिक कार्रवाई और सुस्ती पर सवाल
प्रशासन ने दोषियों की संपत्ति पर कुर्की (अटैचमेंट) के नोटिस चस्पा किए और संपत्ति जब्त करने की प्रक्रिया शुरू की, लेकिन एक साल बीतने के बावजूद:
- मुख्य आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं हुई।
- गबन की गई राशि की पूर्ण वसूली नहीं हो पाई।
- जांच प्रक्रिया में गति की कमी दिख रही है।
रिंकू चौरसिया ने प्रशासन पर निशाना साधते हुए पूछा,
“जब भ्रष्टाचार प्रमाणित है, फर्जी बिल और दस्तावेज सामने आ चुके हैं, कुर्की के आदेश हो चुके हैं, तो फिर दोषियों को जेल भेजने में इतनी देरी क्यों? गरीबों का पैसा लूटने वालों को संरक्षण क्यों मिल रहा है?”
उच्च न्यायालय में मामला विचाराधीन
वर्तमान में यह मामला माननीय मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में विचाराधीन है। रिंकू चौरसिया ने विश्वास जताया कि न्यायालय जनहित में सख्त और ऐतिहासिक फैसला सुनाएगा। उन्होंने चेतावनी दी कि पिछले 15 वर्षों से रक्तदान, पर्यावरण संरक्षण और जनसेवा में समर्पित रहने के कारण वे इस लड़ाई को अंत तक जारी रखेंगे।
प्रमुख मांगें
समाजसेवी रिंकू रितेश चौरसिया ने निम्नलिखित मांगें रखी हैं:
- घोटाले के मुख्य आरोपियों की तत्काल गिरफ्तारी।
- हड़पी गई करोड़ों की राशि को सरकारी खजाने में वापस जमा कराना।
- ऐसे दोषी संस्थानों का लाइसेंस स्थायी रूप से रद्द करना, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं न हों।
यह मामला न केवल भ्रष्टाचार का, बल्कि गरीबों के स्वास्थ्य अधिकारों के साथ खिलवाड़ का प्रतीक बन चुका है। जनता और सामाजिक कार्यकर्ताओं की उम्मीद है कि प्रशासन और न्यायपालिका जल्द ही ठोस कदम उठाएंगे, ताकि दोषियों को सजा मिले और लूटे गए धन की वसूली हो सके।

