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मस्तूरी विधायक दिलीप लहरिया ने छेरछेरा पुन्नी त्यौहार पर दी हार्दिक बधाई

विधायक दिलीप लहरिया ने प्रदेशवासी एवं मस्तूरी विधानसभा वासियों को छत्तीसगढ़ पारंपरिक लोक पर्व “छेरछेरा पुन्नी त्यौहार” की दी बधाई

अतुल्य भारत चेतना (वीरेंद्र यादव)

बिलासपुर/मस्तूरी। मस्तूरी विधानसभा क्षेत्र के लोकप्रिय विधायक एवं प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ी लोक गायक श्री दिलीप लहरिया ने छत्तीसगढ़ के पारंपरिक लोक पर्व छेरछेरा पुन्नी के पावन अवसर पर पूरे प्रदेशवासियों तथा मस्तूरी विधानसभा क्षेत्र के निवासियों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं दी हैं। उन्होंने इस अवसर पर सभी की सुख, समृद्धि, खुशहाली तथा निरंतर प्रगति की कामना की।

विधायक श्री लहरिया ने अपने संदेश में कहा कि छेरछेरा पुन्नी त्यौहार महादान, दानशीलता और सामाजिक समरसता का प्रतीक है। यह पर्व छत्तीसगढ़ की समृद्ध, गौरवशाली तथा मानवीय मूल्यों से भरपूर परंपराओं को जीवंत रूप प्रदान करता है। नई फसल के घर आने की खुशी में पौष मास की पूर्णिमा को बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाने वाला यह लोक पर्व प्रदेश की कृषि संस्कृति से गहराई से जुड़ा हुआ है।

पौराणिक मान्यता के अनुसार, इस दिन भगवान शिव ने माता अन्नपूर्णा से भिक्षा ग्रहण की थी। इसी परंपरा को जीवित रखते हुए छेरछेरा पर्व पर लोग धान सहित अन्य अन्न का दान करते हैं, जिससे परस्पर सहयोग, करुणा और मानवता की भावना मजबूत होती है। बच्चे टोलियां बनाकर घर-घर जाकर “माई कोठी के धान ला हेरहेरा” जैसे पारंपरिक गीत गाते हैं और दान मांगते हैं, जो सामाजिक एकता का प्रतीक है।

विधायक श्री लहरिया ने आगे कहा कि यह पर्व हमें समाज में आपसी प्रेम, सौहार्द तथा साझा समृद्धि की भावना को मजबूत करने की प्रेरणा देता है। यह छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति की आत्मा है, जो दान और समर्पण की जीवंत मिसाल पेश करता है।

गौरतलब है कि छेरछेरा पुन्नी छत्तीसगढ़ का एक प्रमुख फसल उत्सव है, जो हर साल पौष पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस बार यह पर्व प्रदेश भर में बड़े उत्साह के साथ मनाया गया। विधायक श्री दिलीप लहरिया, जो खुद एक प्रसिद्ध लोक कलाकार हैं, हमेशा छत्तीसगढ़ी संस्कृति और परंपराओं के संवर्धन में सक्रिय रहते हैं।

इस अवसर पर मस्तूरी क्षेत्र के निवासियों ने विधायक की इस पहल की सराहना की और पर्व की शुभकामनाएं व्यक्त की।

छेरछेरा पुन्नी त्यौहार के पारंपरिक गीत

छत्तीसगढ़ का प्रसिद्ध लोक पर्व छेरछेरा पुन्नी (या छेरछेरा) नई फसल की खुशी और दान की परंपरा का प्रतीक है। इस पर्व पर बच्चे और युवाओं की टोलियां घर-घर जाकर अन्न (मुख्य रूप से धान) का दान मांगते हैं। वे पारंपरिक गीत गाते हुए दान मांगते हैं, जो छत्तीसगढ़ी भाषा में होते हैं और सामाजिक समरसता, दानशीलता की भावना को दर्शाते हैं।

ये गीत सरल, लयबद्ध और दोहराव वाले होते हैं, ताकि बच्चे आसानी से गा सकें। मुख्य गीत इस प्रकार हैं:

  1. सबसे लोकप्रिय गीत:textछेर छेरा, माई कोठी के धान ला हेर हेरा!(अर्थ: छेरछेरा आ गया, मां कोठी से धान निकालो और दे दो!)यह गीत घर के दरवाजे पर गाया जाता है। “हेर हेरा” का मतलब है “निकालो-निकालो” या दे दो।
  2. दान न मिलने पर गाया जाने वाला गीत (जब तक दान न मिले, तब तक गाते रहते हैं):textअरन बरन कोदो दरन, जब्भे देबे तब्भे टरन!(अर्थ: अरहर, बाजरा, कोदो, कुटकी – सब कुछ दे दो, जब तक दान दोगे तब तक हम नहीं जाएंगे!)यह मजाकिया अंदाज में दान मांगने का तरीका है, जो बच्चों को देर तक गाने के लिए प्रेरित करता है।
  3. अन्य रूपांतर:
    • छेरि छेरा छेर बरकतीन छेर छेरा!
    • छेरी के छेरा छेरछेरा… माई कोठी के धान ला हेरहेरा!
    • आ गे हे छेरछेरा, कोठी के धान ला हेरव संगवारी!

ये गीत क्षेत्र के अनुसार थोड़े भिन्न हो सकते हैं, लेकिन मूल भाव दान मांगने और फसल की खुशी का ही होता है। बच्चे झोला या टोकनी लेकर टोलियां बनाते हैं, नाचते-गाते हुए घूमते हैं।

ये पारंपरिक गीत छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति की जीवंत झलक दिखाते हैं और पर्व को उत्साहपूर्ण बनाते हैं। आज भी गांवों में ये गीत पूरे जोश के साथ गूंजते हैं!

छेरछेरा पुन्नी त्यौहार के अन्य पारंपरिक लोकगीत

छत्तीसगढ़ के छेरछेरा पर्व पर गाए जाने वाले लोकगीत मुख्य रूप से दान मांगने के लिए होते हैं। ये गीत छत्तीसगढ़ी भाषा में सरल, लयबद्ध और दोहराव वाले हैं। क्षेत्रीय भिन्नताओं के कारण इनमें थोड़े बदलाव मिलते हैं, लेकिन मूल भाव फसल की खुशी, दानशीलता और सामाजिक समरसता का ही रहता है। पहले बताए गए मुख्य गीतों (“छेर छेरा, माई कोठी के धान ला हेर हेरा!” और “अरन बरन कोदो दरन…”) के अलावा कुछ अन्य लोकप्रिय रूपांतर और गीत इस प्रकार हैं:

  1. एक लोकप्रिय रूपांतर:textछेरि छेरा छेर बरकतीन छेर छेरा! माई कोठी के धान ला हेर हेरा!(अर्थ: छेरछेरा आ गया, बरकत वाला छेरछेरा! मां, कोठी से धान निकालो और दे दो!)
  2. बच्चों की टोली का गीत:textसबो संगवारी मिलके, झोला धरके जाथे। सब के मुहाटी मा, जा जा के चिल्लाथे॥ छेरछेरा छेरछेरा, माई कोठी के धान ल हेरहेरा। अरन बरन कोदो दरन, जभे देबे तभे टरन॥(अर्थ: सभी साथी मिलकर झोला लेकर जाते हैं, हर मोहल्ले में जाकर चिल्लाते हैं। छेरछेरा आ गया, धान दे दो, जब तक दोगे तब तक नहीं जाएंगे!)
  3. अन्य क्षेत्रीय गीत:
    • छेरछेरा, छेरछेरा, माई कोठी के धान ला हेरहेरा!
    • आ गे हे छेरछेरा, कोठी के धान ला हेरव संगवारी!
    • छेरी के छेरा छेरछेरा… माई कोठी के धान ला हेरहेरा!

ये गीत बच्चे झोला या टोकनी लेकर टोलियां बनाकर गाते हैं, नाचते-कूदते हैं और घर-घर दान मांगते हैं। कई बार युवा डंडा नृत्य के साथ भी इन गीतों को गाते हैं। ये परंपराएं गांवों में आज भी जीवंत हैं और पर्व को उत्साह से भर देती हैं।

ये तस्वीरें छेरछेरा पर्व पर बच्चों को गीत गाते और दान मांगते हुए दिखाती हैं – छत्तीसगढ़ की जीवंत लोक संस्कृति की सुंदर झलक!

छेरछेरा पर्व में डंडा नृत्य

छत्तीसगढ़ का पारंपरिक लोक पर्व छेरछेरा पुन्नी न केवल अन्न दान का प्रतीक है, बल्कि इसमें डंडा नृत्य (या सैला नृत्य) एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह मुख्य रूप से युवाओं और पुरुषों द्वारा किया जाने वाला समूह नृत्य है, जो पर्व के उत्साह को दोगुना कर देता है।

डंडा नृत्य की विशेषताएं:

  • कब और कैसे किया जाता है: छेरछेरा से एक-दो सप्ताह पहले ही गांवों में डंडा नृत्य शुरू हो जाता है। युवकों की टोलियां घर-घर जाकर नृत्य करती हैं और दान (धान या नकद) मांगती हैं। नृत्य का समापन पौष पूर्णिमा (छेरछेरा) के दिन होता है।
  • नृत्य शैली: नर्तक हाथों में एक या दो बांस की डंडियां लेकर वृत्ताकार घेरा बनाते हैं। वे डंडों को आपस में टकराते हैं, जिससे ताल और लय पैदा होती है। कभी ऊपर उछलकर, कभी झुककर, अगल-बगल घूमते हुए त्रिकोण, चतुष्कोण जैसी आकृतियां बनाते हैं। साथ में मंदार, मंजीरा या झांझ की धुन पर लोकगीत गाए जाते हैं।
  • वेशभूषा: नर्तक धोती-कुर्ता, जैकेट, सिर पर पगड़ी (कभी मोर पंख से सजी) पहनते हैं।
  • महत्व: यह नृत्य दानशीलता, सामाजिक समरसता और फसल की खुशी को व्यक्त करता है। इसे छत्तीसगढ़ का “रास” भी कहा जाता है। कुछ क्षेत्रों में इसे सैला नृत्य के नाम से जाना जाता है।

यह नृत्य बच्चों के गीत गाने और महिलाओं के सुआ नृत्य के साथ मिलकर पर्व को पूर्ण बनाता है। गांवों में आज भी यह परंपरा बड़े उत्साह से निभाई जाती है।

ये तस्वीरें छेरछेरा पर्व और छत्तीसगढ़ के संबंधित लोक नृत्यों (डंडा नृत्य, सुआ नृत्य आदि) की जीवंत झलक दिखाती हैं – परंपरा का सुंदर प्रदर्शन!

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News Desk

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