शहडोल – मध्यप्रदेश का स्वास्थ्य ढांचा इन दिनों एक ऐसे खतरनाक मोड़ पर खड़ा है, जहाँ मरीज अपनी जान अस्पताल के भरोसे छोड़ता है और बदले में उसे यह जवाब मिलता है— “डॉक्टर आएँ या न आएँ, जो मौजूद है वही इलाज करेगा।”
देवंता अस्पताल विवाद की आग अभी ठंडी भी नहीं पड़ी थी कि अब शहर के पाली रोड स्थित श्रीराम अस्पताल पर लगे सनसनीखेज आरोपों ने शहडोल के निजी स्वास्थ्य बाजार की असलियत उजागर कर दी है। आरोप है कि लाइसेंस डॉक्टरों के नाम पर अस्पताल चल रहा है, जबकि इलाज वार्ड बॉय और स्टाफ के भरोसे किया जा रहा है।
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रात 11:30 बजे की वह भयावह घड़ी…
16 दिसंबर की रात करीब 11:30 बजे, गुरुनानक चौक निवासी कमलेश जैन को गंभीर हालत में श्रीराम अस्पताल लाया गया।
परिजन एम्बुलेंस, ऑक्सीजन और जान बचाने की उम्मीद लेकर इमरजेंसी में दाखिल हुए। उन्हें लगा था कि अब डॉक्टर दौड़ पड़ेंगे, मशीनें चलेंगी, CPR शुरू होगा।
लेकिन परिजनों का आरोप है कि इमरजेंसी में न कोई डॉक्टर मौजूद था, न ICU का कोई प्रभारी।
वहाँ मिला एक युवक, जिसने खुद को डॉक्टर बताकर तुरंत इंजेक्शन लगा दिया और एक महिला स्टाफ, जो चुपचाप पर्ची पर दवाइयाँ लिखती रही।
परिजन लगातार पूछते रहे—
“डॉक्टर कहाँ हैं?”
“ICU का प्रभारी कौन है?”
लेकिन जवाब में मिला सन्नाटा… और लापरवाही।
प्रश्न जो प्रशासन से जवाब माँगते हैं
क्या निजी अस्पतालों में बिना डॉक्टर इलाज हो रहा है?
क्या वार्ड बॉय और स्टाफ को डॉक्टर बनाकर पेश किया जा रहा है?
स्वास्थ्य विभाग की नियमित जांच आखिर कहाँ है?
देवंता अस्पताल विवाद के बाद भी सबक क्यों नहीं लिया गया?
शहडोल में निजी अस्पताल अब इलाज के नहीं, प्रयोग के केंद्र बनते जा रहे हैं। सवाल यह है कि किसी की जान जाने के बाद ही क्या प्रशासन जागेगा?

